विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

मां की लोरी बनकर यूपी-बिहार के घर-घर गूंजा है ये भोजपुरी लोकगीत, लता मंगेशकर ने सुर देकर बना दिया था अमर 

Published: Tue, 08 Sep 2026 08:33 PM (IST)

आधुनिक जिंदगी में हम भले ही 'ट्विंकल-ट्विंकल' तक पहुंच गए हों, लेकिन भोजपुरी लोक संस्कृति की जड़ों में रची-बसी लोरियों का कोई सानी नहीं है।

'ऐ चंदा मामा आरे आवा...' सिर्फ लोरी नहीं, बिहार-पूर्वांचल के बचपन की मीठी याद है ये लोकगीत (Image Source: YT)

'ऐ चंदा मामा आरे आवा...' सिर्फ लोरी नहीं, बिहार-पूर्वांचल के बचपन की मीठी याद है ये लोकगीत (Image Source: YT)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन के दिनों में जब भी नींद आंखों से कोसों दूर रहती थी, तब मां की गोद और उनकी मीठी आवाज में गाई गई लोरियां जादू-सा काम करती थीं। आज हम आपको वात्सल्य रस से भरपूर एक ऐसे कालजयी लोकगीत के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे सुने बिना शायद ही किसी बिहारी का बचपन बीता होगा।

जी हां, हम बात कर रहे हैं "ऐ चंदा मामा आरे आवा..." की, जो महज कोई लोरी नहीं, बल्कि ममता का वो समंदर है जो हर सुनने वाले को उसके बचपन की सुनहरी गलियों में वापस ले जाता है।

क्या आपने कभी सोचा है कि चंदा मामा को धरती पर बुलाने की इस मनुहार में मां का कौन-सा अनकहा प्यार छिपा है? वास्तव में ये पंक्तियां अपने बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लाने की वो कोशिश हैं, जिसे एक मां अपनी आत्मा में समेटे हुए है। आइए, डिटेल में इस भोजपुरी लोकगीत के बारे में जानते हैं।

Bhojpuri Childhood Songs

(Image Source: AI-Generated)

भोजपुरी की इस मशहूर लोरी की कहानी

इस लोरी में एक मां के अपने बच्चे के प्रति अगाध प्रेम और दुलार का वर्णन है, जिसे भोजपुरी लोक संस्कृति की सबसे अमूल्य धरोहरों में से एक माना जाता है। बता दें, यहां "चंदा मामा" को बुलाना दरअसल प्रकृति और बच्चे के बीच एक खूबसूरत रिश्ता जोड़ने का प्रतीक है, जो बच्चे को खुशी और सुकून देता है।

गीत की शुरुआत में मां चंदा मामा से मनुहार करते हुए कहती है:

"चंदा मामा आरे आवा, पारे आवा,
नदिया किनारे आवा..."

यहां मां चंदा मामा से गुहार लगा रही है कि आसमान की दूरियां मिटाकर, नदियों के किनारे से होते हुए वे सीधे उसके बच्चे के पास आ जाएं। वह अपने बच्चे की खुशी के लिए चांद को भी जमीन पर उतार लाना चाहती है।

सोने की कटोरी और 'दूध-भात' का लाड़-दुलार

इस लोरी के बोल भले ही बहुत सीधे और सरल लगते हों, लेकिन इनके पीछे छुपे वात्सल्य के जज्बात बहुत मजबूत हैं। इस गीत की आगे की पंक्तियां मां के दुलार को और बढ़ा देती हैं:

"सोने के कटोरिया में दूध-भात लेले आवा,
बबुआ के मुंहवा में घुटुक..."

इन लाइनों का मतलब है, "हे चंदा मामा, जब तुम आना तो सोने की कटोरी में दूध और चावल लेकर आना, और मेरे प्यारे बच्चे को अपने हाथों से प्यार से खिला जाना।"

यहां सोने की कटोरी बच्चे के लिए मां के सबसे अनमोल सपनों का प्रतीक है और 'दूध-भात' उस सादगी भरे पोषण का, जो हर मां अपने बच्चे को देना चाहती है।

Bihar Folk Lullaby

(Image Source: AI-Generated)

वात्सल्य रस से सराबोर है यह लोकगीत

इस लोरी की धुन और शब्द इतने मीठे हैं कि यह श्रोता के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। भोजपुरी लोकगीतों की यही खासियत रही है कि उन्होंने रिश्तों की मिठास, बचपन की मासूमियत और मां की ममता को अपने गीतों में बहुत ही संवेदनशीलता के साथ पिरोया।

पारंपरिक शैली में गाए जाने वाले इस गीत को सुनकर आज भी लोग भावुक हो जाते हैं और उन्हें अपनी मां की याद आ जाती है। यह गीत केवल सुलाने के लिए नहीं, बल्कि उस सुरक्षा और प्यार को महसूस करने के लिए गाया जाता है, जो एक मां की बांहों में मिलता है।

लता दीदी की आवाज ने बना दिया अमर

1965 में बनी भोजपुरी फिल्म 'भौजी' से इस लोकगीत को मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह मिली और लता मंगेशकर ने इसे अपनी आवाज देकर अमर कर दिया। आज भले ही दुनिया बहुत मॉडर्न हो गई है और 'ट्विंकल-ट्विंकल' जैसी अंग्रेजी कविताओं का चलन बढ़ गया है, लेकिन 'ऐ चंदा मामा आरे आवा...' जैसी लोक धुनें हमें हमेशा अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर रखती हैं।

यह भी पढ़ें- इस भोजपुरी लोकगीत में सुनाई देती है पति से बिछड़ी पत्नी के दिल की पीड़ा, महेंद्र मिसिर की ये रचना है बेहद खास

यह भी पढ़ें- शारदा सिन्हा के मशहूर गीत 'पनिया के जहाज से...' में क्या होता है 'पलटनिया' का मतलब? बेहद दिलचस्प है कहानी