इस भोजपुरी लोकगीत में सुनाई देती है पति से बिछड़ी पत्नी के दिल की पीड़ा, महेंद्र मिसिर की ये रचना है बेहद खास
जब बात भोजपुरी के सबसे मार्मिक गीतों की हो, तो महेन्द्र मिसिर का अमर गीत "अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया रे..." हमेशा सबसे ऊपर रहता है।

बेहद खास है महेन्द्र मिसिर का ये कालजयी लोकगीत (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भोजपुरी संगीत की माटी में जब भी विरह और तड़प की गूंज सुनाई देती है, पूरबी सम्राट महेन्द्र मिसिर का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। उनका कालजयी लोकगीत "अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया रे..." महज कोई गाना नहीं, बल्कि एहसासों का वो समंदर है जो हर सुनने वाले को अंदर तक झकझोर देता है।
क्या आपने कभी सोचा है कि नागिन के इस डंक में कौन-सा अनकहा दर्द छिपा है? वास्तव में ये पंक्तियां किसी सर्पदंश की नहीं, बल्कि अपनों से दूर होने की वो छटपटाहट हैं जिसे एक स्त्री अपनी आत्मा में समेटे हुए है। आइए, डिटेल में इसके बारे में जानते हैं।

(Image Source: AI-Generated)
'अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया रे' का असल मतलब
यह गीत भोजपुरी की 'पूरबी' शैली में रचा गया है। इस गीत में एक स्त्री की असहनीय पीड़ा का वर्णन है। यहां "नगिनिया" का डसना दरअसल विरह के उस डंक का प्रतीक है, जो नायिका को अंदर तक तड़पा रहा है।
गीत की शुरुआत में नायिका अपनी ननद से कहती है:
"अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया रे
ए ननदी, दियरा जरा दे।
दियरा जरा दे, अपना भइया के जगा दे..."
यहां नायिका अपनी ननद से दीया जलाने और अपने भाई यानी नायिका के पति को जगाने की गुहार लगा रही है। वह कह रही है कि उसकी नस-नस में दर्द की लहरें उठ रही हैं।
पति का प्रेम ही है नायिका का असली 'वैद्य'
इस गीत के बोल भले ही बहुत सीधे लगते हों, लेकिन इनके पीछे छुपे जज्बात बहुत मजबूत हैं। इस गाने की आगे की पंक्तियां नायिका के दर्द को और बढ़ा देती हैं:
"एक त मुएनीं हम अपना दरद से
दोसरे ई रतिया अन्हरिया रे...
पटना सहरिया से वैदा बोला दे"
इन लाइनों का मतलब है, "एक तो मैं अपने दर्द से मरी जा रही हूं, और ऊपर से यह रात भी इतनी अंधेरी है।" वह ननद से कहती है कि पटना शहर से किसी वैद्य को बुला लाओ, क्योंकि उसके पोर-पोर में दर्द उठ रहा है।
हालांकि, महेन्द्र मिसिर आखिर में यह साफ कर देते हैं कि यह दर्द किसी आम वैद्य की दवा से ठीक होने वाला नहीं है।
"कहत महेन्दर, ननदी, बैदा बोला दे
उनहीं से उतरी ई लहरिया रे"
यहां 'वैद्य' का असल मतलब उसका पति है। केवल उसके आने या उसके स्पर्श से ही विरह की यह 'लहरिया' उतरेगी।
विरह में सुलगती आग का अहसास है यह 'पूरबी' गीत
इस गाने की धुन और शब्द इतने मार्मिक हैं कि यह श्रोता के मन में एक गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। महेन्द्र मिसिर की यही खासियत थी कि उन्होंने स्त्रियों के मन की पीड़ा, उनके वियोग और अकेलेपन को अपने गीतों में बहुत ही संवेदनशीलता के साथ पिरोया।
'पूरबी' गायन शैली में गाए जाने वाले इस गीत को सुनकर आज भी लोग भावुक हो जाते हैं। यह गीत मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि विरह की उस आग को महसूस करने के लिए गाया जाता है, जो किसी के इंतजार में सुलगती रहती है।
मॉडर्न युग में भी दिलों पर कर रहा है राज
आज भले ही दुनिया बहुत मॉडर्न हो गई है और संगीत के तरीके बदल गए हैं, लेकिन 'अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया रे' जैसी लोक धुनें हमें हमेशा अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़कर रखती हैं। यह गीत हमें बताता है कि प्रेम और विरह की तड़प किसी भी युग में कम नहीं होती। चाहे कोई महफिल हो या एकांत कोना, महेन्द्र मिसिर की यह धुन हमेशा ऐसे ही लोगों के दिलों को छूती रहेगी।
