मां दुर्गा से सीधे संवाद का जरिया है बिहार का 'पचरा' गीत, नीम के पेड़ के नीचे महिलाएं करती हैं देवी आराधना
पचरा बिहार के लोकगीतों का हिस्सा है, जिसे देवी आराधना के लिए गाया जाता है।

बिहार का मशहूर लोकगीत है पचरा (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के गानों की बात करें, तो आपके दिमाग में सबसे पहले फिल्मी भोजपुरी गाने आते होंगे, लेकिन बिहार के लोकगीत इनसे कहीं आगे हैं। यहां के लोकगीतों में पचरा शामिल है, जो मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि देवी आराधना के लिए गाया जाता है।
पचरा गीतों में ‘निमिया के डाढ़ मईया, लावेली झुलुअवा’ काफी मशहूर है, जो नवरात्र के दिनों में बिहार के हर घर में बजता है। इन गीतों में मां दुर्गा और उनके स्वरूप शीतला माता की आराधना की जाती है। आइए जानें कि पचरा गीत होते क्या हैं और क्यों ये इतने खास हैं।
क्या होते हैं पचरा गीत?
पचरा गीत भक्त और मां दुर्गा के बीच बातचीत का जरिया माने जाते हैं। माना जाता है कि पचरा गीत सुनकर देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों के घर आती हैं। इसलिए नवरात्र में मंदिरों या नीम के पेड़ के नीचे बैठकर महिलाएं पचरा गाती हैं।
इन गीतों में कोई मुश्किल मंत्र या श्लोक नहीं होते हैं। ये गीत भक्त और माता के बीच बातचीत के रूप में गाए जाते हैं, जिनमें बेहद आसान भोजपुरी शब्दों का इस्तेमाल होता है। भक्त मां दुर्गा को अपनी माता या बेटी समझकर गीत गाते हैं और उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं।
कैसे गाया जाता है पचरा?
पचरा गीत बहुत भावुक करने वाले होते हैं और इन्हें लय में गाया जाता है। आमतौर पर इसे महिलाएं समूह में गाती हैं। एक मुख्य गायिका पंक्ति की शुरुआत करती हैं और बाकी महिलाएं उसमें टेक लगाकर यानी उसे दोहराकर साथ देती हैं।
इन गीतों की शुरुआत बहुत धीमी लय के साथ होती है और धीरे-धीरे ये तेज होता जाता है। ये गांव-देहात का पारंपरिक गीत है, इसलिए इन्हें ढोलक और मंजीरे जैसे वाद्य यंत्रों पर ही गाया जाता है। कई बार सिर्फ तालियां बजाकर भी पचरा गाया जाता है।
साथ ही, पचरा हमेशा संवाद की शैली में गाया जाता है, जैसे मां भगवती और भक्त आपस में बात कर रहे हैं। जैसे-
मां दुर्गा कहती हैं-
सुतल बाडु के जागल ए मलिनिया
के बूंद एक ना
मालिन पनिया पियवतु
हो के बूंद एक न
इस पर मालिन कहती है-
कईसे के पनिया पियाई ऐ सितली मईया
के मोरे गोदिया न
बाड़े बलका नादान
मईया मोरे गोदिया न
इसी तरह बातचीत के लहजे में पचरा गाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इन गीतों को सुनकर देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों को आशीर्वाद देती हैं।
क्यों इतने खास हैं पचरा गीत?
पचरा गीत बहुत आसान और देसी शब्दों से बने होते हैं। इसलिए हर किसी के लिए ये गीत गाना काफी आसान होता है। इसके अलावा, पचरा गीतों में नीम के पेड़ और माता के अलग-अलग रूपों का जिक्र मिलता है। नीम के पेड़ का इन गीतों में खास महत्व है, क्योंकि माना जाता है कि नीम मां दुर्गा को काफी प्रिय है।
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, चेचक के समय भी शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए पचरा गाया जाता है और नीम के पत्तों से मरीज को सहलाया जाता है। इन गीतों की सबसे बड़ी खासियत है कि ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मौखिक रूप से ही आगे बढ़ते हैं। आज कई बड़े-बड़े कलाकारों ने पचरा गाकर इन्हें और भी मशहूर कर दिया है।
