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    क्या सच में Wi-Fi रेडिएशन से ब्रेन ट्यूमर का खतरा रहता है? डॉक्टर ने बताई इस डर की पूरी सच्चाई

    Updated: Tue, 09 Jun 2026 11:36 AM (IST)

    क्या आपके आस-पास मौजूद डिजिटल डिवाइस आपके दिमाग को नुकसान पहुंचा रहे हैं, या ये सिर्फ इंटरनेट पर फैलाई गई बिना सिर-पैर की कोई जानकारी है? ...और पढ़ें

    क्या सच में Wi-Fi रेडिएशन ब्रेन ट्यूमर की वजह बन सकता है? (Image Source: AI-Generated)

    क्या सच में Wi-Fi रेडिएशन ब्रेन ट्यूमर की वजह बन सकता है? (Image Source: AI-Generated) 

    HighLights

    1. मोबाइल/वाई-फाई रेडिएशन का ब्रेन ट्यूमर से सीधा संबंध नहीं है

    2. नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन डीएनए को सीधे नुकसान नहीं पहुंचाता है

    3. ब्रेन ट्यूमर के वास्तविक कारण जेनेटिक या आयोनाइजिंग रेडिएशन है

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज का समय पूरी तरह से डिजिटल हो चुका है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हमारा स्मार्टफोन, Wi-Fi राउटर और ब्लूटूथ डिवाइस हमारे साथ रहते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन वायरलेस गैजेट्स से निकलने वाला रेडिएशन आपके दिमाग को नुकसान पहुंचा रहा है?

    सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे दावे किए जाते हैं कि Wi-Fi और फोन के इस्तेमाल से ब्रेन ट्यूमर हो सकता है। आइए जानते हैं कि इन दावों में कितनी सच्चाई है और विज्ञान इस बारे में क्या कहता है।

    does mobile phone radiation cause brain tumor

    (Image Source: AI-Generated) 

    क्या कहता है विज्ञान और एक्सपर्ट्स?

    मैरिंगो एशिया इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो एंड स्पाइन (MAIINS) के चेयरमैन डॉ. प्रवीण गुप्ता ने इस सबसे बड़े भ्रम को दूर किया है। उनका साफ तौर पर कहना है कि अब तक हुई वैज्ञानिक रिसर्च में मोबाइल फोन या वाई-फाई के इस्तेमाल और ब्रेन ट्यूमर के बीच कोई भी सीधा संबंध नहीं पाया गया है।

    हाल ही में दुनिया भर में हुए बड़े-बड़े अध्ययनों से भी यह साबित नहीं हुआ है कि लंबे समय तक फोन चलाने वाले लोगों को ब्रेन ट्यूमर का खतरा ज्यादा होता है।

    आयोनाइजिंग बनाम नॉन-आयोनाइजिंग

    डॉ. गुप्ता बड़ी ही आसानी से समझाते हैं कि हमारे फोन और Wi-Fi से जो तरंगे निकलती हैं, उन्हें रेडियोफ्रीक्वेंसी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड्स कहा जाता है। यह 'नॉन-आयोनाइजिंग' रेडिएशन होती हैं। इसके विपरीत, एक्स-रे या गामा किरणें 'आयोनाइजिंग' रेडिएशन की श्रेणी में आती हैं, जिनसे कैंसर का खतरा बढ़ता है।

    सबसे राहत की बात यह है कि नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन में हमारे डीएनए को सीधे नुकसान पहुंचाने की ताकत बहुत कम होती है। यही कारण है कि वैज्ञानिक इन रोजमर्रा के उपकरणों को ब्रेन ट्यूमर की वजह नहीं मानते हैं।

    तो फिर यह डर और भ्रम क्यों फैला?

    लोगों के मन में यह डर साल 2011 की एक रिपोर्ट के बाद बैठा। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन को "संभावित रूप से कैंसरकारी" (Group 2B) की लिस्ट में डाल दिया था।

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    डॉ. गुप्ता इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि फोन से कैंसर होता है। इसका मतलब सिर्फ इतना था कि उस वक्त विज्ञान के पास पक्के सबूत नहीं थे और आगे और अधिक रिसर्च की जरूरत थी। इसके बाद हुए लाखों लोगों के स्वास्थ्य आंकड़ों के विश्लेषण में मोबाइल चलाने वालों में सामान्य लोगों के मुकाबले ट्यूमर, जैसे ग्लियोमा या मेनिंजियोमा का खतरा ज्यादा नहीं दिखा।

    WiFi radiation brain tumor

    (Image Source: AI-Generated)

    क्या आपके घर और ऑफिस का Wi-Fi पूरी तरह सुरक्षित है?

    अगर बात Wi-Fi की करें, तो डॉ. गुप्ता बताते हैं कि घरों और ऑफिस में लगे वाई-फाई से निकलने वाला रेडियोफ्रीक्वेंसी एक्सपोजर मोबाइल फोन के मुकाबले भी काफी कम होता है। इसलिए Wi-Fi को ब्रेन ट्यूमर के खतरे से जोड़कर देखना बिल्कुल गलत है।

    फिर भी, विज्ञान हमेशा नई चीजों की खोज करता रहता है और नई तकनीक के लंबे असर पर रिसर्च अभी भी जारी है। हमें बस 'डर' और 'सावधानी' के बीच का फर्क समझना होगा।

    डरें नहीं, एहतियात बरतें

    अगर आप फिर भी थोड़ी ज्यादा सावधानी बरतना चाहते हैं, तो डॉ. प्रवीण गुप्ता ने कुछ आसान से तरीके बताए हैं:

    • बात करते समय फोन को सीधे कान से लगाने के बजाय स्पीकरफोन या ईयरफोन का इस्तेमाल करें।
    • लंबी कॉल्स करने के बजाय टेक्स्ट मैसेजिंग का सहारा लें।
    • बच्चों का स्क्रीन टाइम और मोबाइल का इस्तेमाल सीमित रखें।

    ये कदम किसी साबित हो चुके खतरे के कारण नहीं, बल्कि सिर्फ एक सामान्य एहतियात के तौर पर अपनाए जा सकते हैं।

    ब्रेन ट्यूमर के असली कारण क्या हैं?

    डॉ. गुप्ता ने स्पष्ट किया है कि ब्रेन ट्यूमर के ज्ञात और असली कारणों में शामिल हैं:

    • जेनेटिक कारण
    • कुछ दुर्लभ सिंड्रोम
    • आयोनाइजिंग रेडिएशन (जैसे एक्स-रे आदि)

    बिना वजह मोबाइल और Wi-Fi के नाम पर डर फैलाने के बजाय लोगों को वैज्ञानिक तथ्यों पर भरोसा करना चाहिए। वर्तमान साक्ष्य यही बताते हैं कि सामान्य इस्तेमाल से ब्रेन ट्यूमर का खतरा नहीं बढ़ता है, हालांकि विज्ञान की बेहतरी के लिए इस क्षेत्र में शोध आगे भी जारी रहने चाहिए।

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