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‘सास नहीं, मां थीं रूपी सोरेन’, सीता सोरेन ने साझा कीं पति दुर्गा के निधन के बाद की भावुक यादें

Published: Thu, 08 Oct 2026 11:39 PM (GMT+05:30)

Rupi Soren Death News: सीता सोरेन ने अपनी सास रूपी सोरेन के निधन पर भावुक श्रद्धांजलि दी, उन्हें सास नहीं ...और पढ़ें

रूपी सोरेन और शिबू सोरेन के साथ सीता सोरेन व उनकी बेटी। (फाइल फोटो)

रूपी सोरेन और शिबू सोरेन के साथ सीता सोरेन व उनकी बेटी। (फाइल फोटो)

राजीव, दुमका। झामुमो के संस्थापक शिबू सोरेन के परिवार की राजनीति को अक्सर संघर्ष, आंदोलन और सत्ता के चश्मे से देखा गया है लेकिन इस परिवार की कहानी का एक भावनात्मक पक्ष भी है। सोरेन परिवार की बड़ी बहू सीता सोरेन इस भावना को गुरुजी की धर्मपत्नी व उनकी सास स्व.रूपी किस्कू सोरेन के निधन के बाद दैनिक जागरण के संग साझा किया हैं।

भर्राए शब्दों में सीता ने कहा कि रूपी सोरेन उनके लिए सास नहीं बल्कि मां थीं, जिन्होंने परिवार के सबसे कठिन दौर में उन्हें संभाला था। रूपी सोरेन के निधन से मर्माहत सीता ने कहा कि पति दुर्गा सोरेन के असमय निधन के बाद रूपी सोरेन ने जिस पीड़ा को अपने हृदय में समेट कर उन्हें संभाला, उसे शब्दों में बयां करना संभव नहीं है।

कहा कि स्व.रूपी सोरेन परिवार की ममता और शक्ति का आधार थीं। कहा कि दुर्गा सोरेन के निधन का वर्ष 2009 में हुआ था। युवा उम्र में पति को खोने के बाद मेरे सामने परिवार, तीन बेटियों और राजनीतिक जीवन की बड़ी जिम्मेदारियां थीं।

उस समय रूपी सोरेन स्वयं भी अपने बड़े बेटे को खोने के गहरे दुख से गुजर रही थीं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी दुखों को समेट कर मुझे संबल दिया था। यह उनके लिए रिश्ते का फर्ज भर नहीं रहा होगा बल्कि उस पारिवारिक संवेदना का हिस्सा था जिसे वह कभी विस्मृत नहीं कर सकती हैं।

कहा कि रूपी सोरेन का अपना जीवन भी संघर्षों से भरा था। शिबू सोरेन के झारखंड आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष के लंबे दौर में उन्होंने परिवार को संभाला। शिबू सोरेन जब आंदोलन के सिलसिले में घर से दूर रहते थे, तब बच्चों की परवरिश और घर की जिम्मेदारी रूपी सोरेन के कंधों पर थी।

उन्होंने दुर्गा, हेमंत और बसंत के साथ बेटी अंजली की परवरिश की और परिवार को एकजुट रखा। सीता कहती हैं कि राजनीतिक जीवन में कठिन समय के दौरान शिबू सोरेन (बाबा) और रूपी सोरेन (मां) ने उनका साथ दिया है। सीता ने कहा कि समय ने सोरेन परिवार को कई मोड़ दिखाए हैं।

राजनीति बदली, रिश्तों के समीकरण बदले और परिवार के सदस्य अलग-अलग राजनीतिक राहों पर भी चले। वर्ष 2024 में वह झामुमो छोड़ कर भाजपा का दामन थाम ली हैं और दुमका से लोकसभा चुनाव भी लड़ीं लेकिन व्यक्तिगत रिश्तों की स्मृतियां राजनीतिक सीमाओं से अलग होती हैं।

रूपी सोरेन के निधन पर उन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि मां, आपका स्नेह, आपका आशीर्वाद और आपकी स्मृतियां हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगी। यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं, उस रिश्ते की अंतिम सार्वजनिक अभिव्यक्ति भी है जिसमें एक बहू ने अपनी सास को मां के रूप में याद किया।

दुर्गा के जाने के बाद जिस मां ने दुख में साथ दिया, आज वही मां चली गईं। पीछे रह गईं उनकी स्मृतियां, उनका स्नेह और उस परिवार की कई पीढ़ियों को जोड़ने वाली उनकी छाया।

मां पूरे परिवार को एक सूत्र में जोड़ कर रखने वाली कड़ी थीं

सीता कहती हैं कि परिवार के भीतर मां की भूमिका किसी राजनीतिक पद से कहीं बड़ी थी। संघर्ष के दिनों में परिवार को संभालने वाली महिला से लेकर 1999 में चुनावी मैदान में उतरने वाली प्रत्याशी तक रूपी सोरेन की यात्रा झारखंड के एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवार की निजी और सार्वजनिक कहानी को एक साथ जोड़ती है और इस कहानी का सबसे मार्मिक अध्याय यही है है कि “आज मां भी हमें छोड़ कर हमेशा के लिए चली गईं।”

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