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Rupi Soren Memories: पुलिस शिबू सोरेन को खोज रही थी, तब रूपी सोरेन ने कहा- यह उनका नहीं; मेरा घर

Published: Thu, 08 Oct 2026 10:12 AM (GMT+05:30)

Rupi Soren Passes Away: रूबी सोरेन के निधन से सोरेन परिवार की एक पीढ़ी का अंत हो गया, जिन्होंने शिबू सोरेन के हर संघर्ष में मजबूत सहारा बनकर साथ दिया।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन। (फाइल फोटो)

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. रूबी सोरेन ने शिबू सोरेन के हर संघर्ष में मजबूत सहारा बनकर साथ दिया।

  2. जेल से रिहाई और बच्चों के पालन-पोषण में उनकी अहम भूमिका रही।

  3. महाजनों और पुलिस से परिवार की रक्षा में दिखाई बहादुरी।

जागरण संवाददाता, दुमका। Hemant Soren, Rupi Soren: प्रचलित कहावत है कि किसी पुरुष की सफलता के पीछे एक महिला का बड़ा योगदान होता है, खासकर मां और जीवनसाथी का। स्व. शिबू सोरेन इस मामले में बेहद सौभाग्यशाली थे। पिता सोबरन सोरेन की हत्या के बाद पूरी तरह टूट चुके शिबू सोरेन को उनकी मां सोनामणि सोरेन ने न सिर्फ संभाला, बल्कि पिता की राह पर आगे बढ़ने की ताकत भी दी।

वहीं, 18 वर्ष की उम्र में शिबू सोरेन से विवाह के बाद रूपी सोरेन जीवन के हर संघर्ष में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर खड़ी रहीं। बुधवार को रूपी सोरेन के निधन के साथ सोरेन परिवार की एक पीढ़ी का अंत हो गया।

सुख-दुख, आंदोलन, संघर्ष, कानूनी लड़ाई और बच्चों के लालन-पालन तक रूपी सोरेन गुरुजी की सबसे बड़ी संबल थीं। यही वजह है कि झारखंड में शिबू और रूपी सोरेन की जोड़ी को आदर्श दांपत्य के रूप में देखा जाता रहा।

जब रूपी सोरेन चांडिल से विवाह कर नेमरा आई थीं, तब तक शिबू सोरेन महाजनों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंक चुके थे। उनके पुत्र और दुमका विधायक बसंत सोरेन बताते हैं कि मां और बाबा की शादी की कहानी उन्होंने घर के बुजुर्गों से सुनी थी। करीब छह दशक पहले शिबू सोरेन दुर्गापूजा के दौरान चांडिल गए थे।

... और इस तरह शिबू सोरेन से रूपी सोरेन की हुई शादी

वहां एक राजपूत परिवार से उनका परिचय था। उसी परिवार के लोगों ने उनसे कहा कि पूजा देखने के साथ इसी गांव में रिश्ता भी कर लीजिए। गांव में एक लड़की है। पहले शिबू सोरेन ने बड़े भाई राजाराम सोरेन की शादी नहीं होने की बात कही। इसके बाद राजाराम सोरेन की शादी हुई और वर्ष 1962 में रूपी सोरेन और शिबू सोरेन जीवनसाथी बने।

शादी के कुछ ही समय बाद शिबू सोरेन को हजारीबाग जेल भेज दिया गया। तब रूपी सोरेन ने अकेले पूरे परिवार को संभाला और पति को जेल से बाहर निकलवाने के लिए प्रयास शुरू किया। बसंत सोरेन बताते हैं कि उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि जेल से रिहाई के लिए कोई बड़ा इंतजाम किया जा सके।

पैसे की व्यवस्था कर शिबू सोरेन को छुड़ाया जेल से 

रूपी सोरेन गांव के एक व्यक्ति के पास गईं और उनसे या तो कुछ रुपये उधार देने या मायके चांडिल जाने का किराया देने का आग्रह किया। इसके बाद वह अपने पिता के पास चांडिल पहुंचीं। नाना ने पैसे की व्यवस्था की और बेटी के साथ हजारीबाग आए। इसके बाद रूपी सोरेन ने शिबू सोरेन को जेल से छुड़ाया और उन्हें नेमरा लेकर आईं।

बसंत बताते हैं कि जेल से बाहर आने के समय शिबू सोरेन काफी कमजोर हो गए थे। रूपी सोरेन ने नेमरा में उनकी देखभाल की और उन्हें फिर से स्वस्थ किया। आंदोलन के दिनों में शिबू सोरेन जंगलों और पारसनाथ की पहाड़ियों में लंबे समय तक फरारी का जीवन बिताते थे। इस दौरान घर की पूरी जिम्मेदारी रूपी सोरेन पर थी।

बसंत के अनुसार, महाजन भी परिवार को परेशान करने पहुंचते थे। एक बार बिष्टु साव कुछ लोगों के साथ जबरन खेत जोतने पहुंचा। मना करने के बावजूद वह नहीं माना तो रूपी सोरेन धान काटने वाला हंसुआ लेकर उसके पीछे दौड़ पड़ीं। उनका रौद्र रूप देखकर वह भागने लगा। इस दौरान रूपी सोरेन और उनकी ननद ने उसे पीटा और खेत पर कब्जा करने से रोका।

जहां हैं, वहीं जाकर तलाश कीजिए 

फरारी के दौरान शिबू सोरेन कभी-कभार ही घर आते थे। कई बार वह अपने साथियों को नेमरा भेजकर परिवार का हालचाल लेते थे। कभी-कभी वह भेष बदलकर खुद भी घर पहुंचते थे। एक बार पुलिस ने गांव में उनसे ही पूछ लिया था कि शिबू सोरेन को इधर देखा है क्या?

बसंत बताते हैं कि वर्ष 1970 के आसपास पुलिस की आवाजाही और पूछताछ काफी बढ़ गई थी। एक बार पुलिस ने रूपी सोरेन से लगातार सवाल किए तो उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यह शिबू सोरेन का घर नहीं, बल्कि रूपी सोरेन का घर है। शिबू सोरेन यहां नहीं आते हैं, जहां हैं वहीं जाकर तलाश कीजिए।

एक समय शिबू सोरेन के लंबे समय तक घर नहीं लौटने पर रूपी सोरेन, उनकी सास और ननद जंगल में उन्हें खोजने तक निकल गई थीं। गोद में दुर्गा सोरेन भी साथ थे। बसंत कहते हैं कि आंदोलन के दौरान उनकी मां ने कभी नेमरा तो कभी अपने मायके चांडिल में रहकर पूरे परिवार को संभाला और बच्चों की परवरिश की।

झारखंड का गठन शिबू सोरेन की ओर से रूपी सोरेन को बड़ा तोहफा

राजनीति में शिबू सोरेन के सक्रिय होने के बाद कार्यकर्ताओं का भी परिवार को सहयोग मिलने लगा। बसंत के अनुसार, शुरुआती दौर में ज्ञानरंजन अक्सर घर आते और सहयोग करते थे। वह कांग्रेस में थे। रूपी सोरेन साइमन मरांडी और धान सिंह मुंडारी का भी जिक्र करती थीं। इनमें धान सिंह मुंडारी का नाम उन्हें विशेष रूप से याद था।

बसंत कहते हैं कि झारखंड का गठन रूपी सोरेन के लिए बाबा की ओर से सबसे बड़ा तोहफा था। वह कहती थीं कि उनका सपना पूरा हो गया। रूपी सोरेन की नजर में शिबू सोरेन उनके आदर्श थे। वहीं, गुरुजी के लंबे राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष के पीछे रूपी सोरेन का त्याग, साहस और साथ हमेशा एक मजबूत आधार बना रहा।

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