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जब गुरुजी की राजनीतिक विरासत संभालने उतरी थीं रूपी सोरेन, 1999 में दुमका से लड़ा लोकसभा चुनाव

Published: Thu, 08 Oct 2026 07:23 AM (IST)

Rupi Soren Political Journey: शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन के निधन पर दुमका से उनके 1999 के लोकसभा चुनाव ...और पढ़ें

झामुमो के संस्थापक दिवंगत शिबू सोरेन और उनकी पत्नी रूपी सोरेन। (फाइल फोटो)

झामुमो के संस्थापक दिवंगत शिबू सोरेन और उनकी पत्नी रूपी सोरेन। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. रूपी सोरेन ने 1999 में दुमका से लोकसभा चुनाव लड़ा था।

  2. बाबूलाल मरांडी से मात्र 4,648 मतों के अंतर से हारीं।

  3. यह चुनाव झारखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय था।

राजीव, दुमका। Rupi Soren Death: झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक दिवंगत शिबू सोरेन की धर्मपत्नी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां रूपी सोरेन का निधन बुधवार की शाम रांची में होने की खबर फैलते ही दुमका में भी मायूसी छा गई। उनका दुमका से भी गहरा लगाव था।

वह शिबू सोरेन उर्फ गुरुजी के आंदोलन के दिनों में उनके साथ यहां आया करती थीं। तब गुरुजी अलग झारखंड राज्य के लिए संघर्ष कर रहे थे और दुमका के खिजुरिया में उनका आवास भी नहीं था।

उस दौर में रूपी सोरेन जब दुमका आती थीं तो शिवपहाड़ के गिधनी में प्रदीप नारायण टुडू के घर में रहती थीं। उस वक्त दुर्गा सोरेन और हेमंत सोरेन काफी छोटे थे और इसी घर में रहकर पढ़ाई करते थे। रूपी सोरेन यहां रहकर बच्चों के साथ गुरुजी का भी ख्याल रखा करती थीं।

बाद में जब गुरुजी खिजुरिया में आवास बनाए तो वहां भी रूपी सोरेन का अक्सर आना-जाना होता था। 1980 से 1990 के दशक में शिबू सोरेन दुमका को अपना राजनीतिक कर्मभूमि बना चुके थे। अलग झारखंड राज्य की लड़ाई के साथ गुरुजी झामुमो का गठन कर सक्रिय राजनीति में कूद गए थे। समय ने करवट ली और गुरुजी से दुमका से सांसद चुने गए और

देखते ही देखते आदिवासियों के नेता बन चुके थे। गुरुजी अलग राज्य की लड़ाई व राजनीतिक दांवपेंच में रहते थे और रूपी सोरेन पूरा घर-संसार संभाल रही थीं। 15 नवंबर 2000 में झारखंड अलग राज्य के गठन से ठीक एक-दो वर्ष पूर्व 1998 और 1999 की बात है।

जब गुरुजी की राजनीतिक विरासत सौंपने की बारी आई तो शिबू सोरेन ने अपनी पत्नी रूपी सोरेन को दुमका के संसदीय चुनाव मैदान में उतार दिए थे। गुरुजी का यह फैसला एकदम से चौंकाने वाली थी।

दरअसल गुरुजी वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के बाबूलाल मरांडी से चुनाव हार गए थे और इसके बाद राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे।

इसके एक वर्ष बाद ही वर्ष 1999 में जब लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तो गुरुजी अपनी राजनीतिक जीवन का सबसे फैसला करते हुए दुमका संसदीय सीट से रूपी सोरेन को उतारने का फैसला किए थे। इस चुनाव में भी रूपी सोरेन का मुकाबला भाजपा के बाबूलाल मरांडी से ही हुआ था।

शिबू सोरेन की जगह मैदान में उतरी थीं रूपी

1998 के लोकसभा चुनाव में शिबू सोरेन को भाजपा के बाबूलाल मरांडी के हाथों दुमका सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद शिबू सोरेन राज्यसभा चले गए थे।

ऐसे राजनीतिक दौर में 1999 में झामुमो ने दुमका से शिबू सोरेन के स्थान पर उनकी पत्नी रूपी सोरेन को उम्मीदवार बनाया। चुनाव में उनके लिए प्रचार की कमान स्वयं शिबू सोरेन और उनके पुत्र दुर्गा सोरेन ने संभाली थी।

बाबूलाल मरांडी से सीधा मुकाबला

दुमका उस समय संताल परगना की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र था। एक ओर शिबू सोरेन की वर्षों पुरानी राजनीतिक पकड़ थी तो दूसरी ओर बाबूलाल मरांडी भाजपा के मजबूत आदिवासी चेहरे के रूप में उभर चुके थे।

1998 में मरांडी ने शिबू सोरेन को लगभग 13 हजार मतों से हराया था। ऐसे में 1999 का चुनाव केवल दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं, बल्कि दुमका में सोरेन परिवार की राजनीतिक पकड़ बनाम भाजपा की बढ़ती ताकत की परीक्षा भी था।

महज 4,648 मतों से रूपी रह गई थीं पीछे

1999 के दुमका लोकसभा चुनाव में भाजपा के बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 मत मिले, जबकि झामुमो की रूपी सोरेन किस्कू को 1,96,493 मत मिले।

इस तरह रूपी सोरेन महज 4,648 मतों से चुनाव हार गईं। कुल वैध मतों के मुकाबले हार का अंतर करीब 0.85 प्रतिशत रहा। यानी चुनाव बेहद करीबी रहा और रूपी सोरेन जीत से ज्यादा दूर नहीं थीं।

चुनाव के बाद सक्रिय राजनीति से दूरी

1999 के बाद रूपी सोरेन ने लोकसभा का कोई दूसरा चुनाव नहीं लड़ा। बाद के वर्षों में उनका सार्वजनिक राजनीतिक जीवन अपेक्षाकृत सीमित रहा। हालांकि सोरेन परिवार की राजनीतिक यात्रा लगातार आगे बढ़ती रही।

उनके पुत्र हेमंत सोरेन झारखंड की राजनीति के प्रमुख चेहरे बने और मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे। रूपी सोरेन परिवार के भीतर एक महत्वपूर्ण और सम्मानित भूमिका में रहीं।

दुमका की राजनीति में दर्ज है खास अध्याय

रूपी सोरेन का 1999 का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस समय हुआ जब अलग झारखंड राज्य की मांग निर्णायक राजनीतिक दौर में पहुंच रही थी।

दुमका में भाजपा और झामुमो के बीच मुकाबला केवल सत्ता का संघर्ष नहीं था, बल्कि आदिवासी नेतृत्व और झारखंड आंदोलन की राजनीतिक दिशा को लेकर भी जनता का फैसला था।

रूपी सोरेन चुनाव जीत नहीं सकीं, लेकिन उनका मुकाबला बेहद करीबी रहा। 4,648 मतों का अंतर बताता है कि दुमका के मतदाताओं ने उस चुनाव में सोरेन परिवार और भाजपा दोनों को लगभग आमने-सामने खड़ा कर दिया था।

यही वजह है कि 1999 का दुमका लोकसभा चुनाव आज भी झारखंड की राजनीतिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाता है।

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