'वेटर' के नाम से बना Bollywood का सबसे आइकॉनिक गाना, लता-रफी और मुकेश ने मिलकर दी थी कल्ट गीत को आवाज
71 साल पहले एक 'वेटर' के नाम पर गाना बनाया गया जो बाद में लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और मुकेश की आवाज में आइकॉनिक बन गया।

वेटर के नाम पर बना कल्ट गीत।
HighLights
71 साल पहले आइकॉनिक गानों से सजी राज कपूर की फिल्म
लता से लेकर रफी साहब तक ने गाए थे कल्ट गाने
एक गाने को ढाबे पर वेटर के नाम से बनाया गया था
आशा बत्रा, नई दिल्ली। 6 सितंबर 1955 को सिनेमाघरों में आई राज कपूर की फिल्म श्री 420 (Shree 420) नए आजाद देश के सपनों, आकांक्षाओं, भटकाव और अंतर्विरोधों को बखूबी समेटती है। यह बेहतर भविष्य की आस में छोटे कस्बों से महानगरों की ओर भागते युवाओं की लाचारी बयां करती है।
लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने राजू का ऐसा किरदार गढ़ा, जो इलाहाबाद से बीए की डिग्री और ईमानदारी का मेडल लेकर बंबई (मुंबई) आता है। यहां आकर उसे समझ आता है कि किताबी ज्ञान और ऊंचे आदर्श पेट भरने के लिए काफी नहीं हैं। उसका जीवन दो किरदारों के बीच झूलता है।
नरगिस के रूप में विद्या जो सदाचार, ज्ञान और नैतिक मूल्यों का प्रतीक है। दूसरी तरफ नादिरा के रूप में माया जो चकाचौंध, अकूत दौलत और भौतिक सुखों का जाल है।
समाज का आईना है फिल्म
फिल्म का नाम अपने आप में एक गहरा व्यंग्य था। धोखाधड़ी के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 420 से प्रेरित इस शीर्षक में सम्मानसूचक 'श्री' शब्द को पिरोया गया था। कहानी के अंत में नायक को अहसास होता है कि असली जालसाज फुटपाथ पर रहने वाले छोटे उचक्के नहीं, समाज के वे प्रतिष्ठित और सूट-बूट वाले रईस हैं, जो रुतबे की आड़ में गरीबों का खून चूसते हैं।
गीतों में छिपा दर्शन
इस फिल्म की असली ताकत इसके बेमिसाल गाने हैं। जीवन का पहला बड़ा फलसफा मेरा जूता है जापानी में छिपा है। राजू खाली हाथ, सिर्फ अपने आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच के दम पर बंबई की धरती पर कदम रखता है। मुकेश की मखमली आवाज इस सीधे-साधे मुसाफिर को एक अद्भुत गरिमा प्रदान करती है।

1955 में इसके मायने बहुत गहरे थे। उस समय का युवा भारत अपनी पहचान तलाशते हुए वैश्विक बदलावों को देख रहा था। ठीक राजू की तरह, जिसने जापानी जूते, इंग्लिश पतलून और रूसी टोपी पहन रखी है, पर उसका दिल पूरी तरह हिंदुस्तानी और संस्कारी है। 'मेरा जूता है जापानी' जहां उम्मीदों का सफर है, वहीं 'दिल का हाल सुने दिलवाला' शहर के बेरहम और तल्ख अनुभवों से रूबरू कराता है।
निश्छल प्रेम का संसार
श्री 20 में 'इचक दाना बीचक दाना' बचपन की यादों, पहेलियों और निश्छल साथ का खूबसूरत गीत है। यह राज और विद्या के उस पवित्र मानसिक संसार को दर्शाता है, जिसमें अभी पैसे की हवस ने जहर नहीं घोला था। उनका नाता सच्ची दोस्ती और छोटी-छोटी खुशियों पर टिका है, वहीं भावनाओं की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति 'प्यार हुआ इकरार हुआ' में दिखाई देती है।
बारिश में एक अदद छतरी के नीचे चलते हुए राज कपूर (Raj Kapoor) और नरगिस (Nargis) का यह दृश्य भारतीय सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया।
चकाचौंध का मायाजाल
विद्या के बाद कहानी में माया का तूफान आता है। विद्या अगर सत्य का मार्ग है, तो माया एक छलावा है। नादिरा पर फिल्माया गया 'मुड़ मुड़ के न देख' इसी चकाचौंध को पर्दे पर लाता है। यहां पैसे की अपनी खनक है और लालच मनोरंजन के लिबास में आता है।
यह राजू के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट है, जहां उसे दो स्त्रियों में नहीं, बल्कि दो अलग-अलग जीवन मूल्यों में चुनाव करना था। इस गाने में मशहूर अभिनेत्री साधना भी बैकग्राउंड डांसर के रूप में पहली बार नजर आई थीं।
अपनों के बीच वापसी
आखिरकार 'रमैय्या वस्तावैय्या' (Ramaiya Vastavaiya) गीत कहानी को वापस समाज और सामूहिकता की ओर मोड़ता है। अमीरी के नशे में राजू अपने गरीब भाई-बहनों से दूर निकल गया था। यह धुन उसे वापस अपनेपन की दुनिया में खींच लाती है। इस गाने के बनने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है।

संगीतकारों की टीम जिस ढाबे पर बैठती थी, वहां रामैया नाम का एक तेलुगु वेटर था। संगीतकार शंकर तेलुगु भाषा समझते थे, उन्होंने बातों-बातों में रमैय्या वस्तावैय्या (रामैया, तुम आओगे ना) कहा और यही अनौपचारिक बोल एक अमर गीत में तब्दील हो गए।
कालजयी सिनेमाई संदेश
श्री 420 के गाने राजू के जीवन के उतार-चढ़ाव का एक पूरा क्रमवार नक्शा खींच देते हैं। आज भी यह फिल्म इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इसमें दिखाया गया भारत बदला नहीं है। लोग आज भी आंखों में सुनहरे ख्वाब लेकर शहरों की तरफ भाग रहे हैं। आशियाने की चाहत आज भी बड़ा मकड़जाल बनी हुई है। अमीर बनने का लालच आज भी इंसानों को भटकाता है और सफेदपोश अपराधी आज भी समाज में इज्जत की जिंदगी जी रहे हैं।
राज कपूर ने इसी कड़वे सच और सामाजिक चिंताओं को श्री 420 के गीतों में पिरो दिया। यही कारण है कि यह श्वेत-श्याम दौर का सिनेमा आज भी हमारे दौर के भारत से सीधे संवाद करता है।
कोरस को भी मिला क्रेडिट
शंकर-जयकिशन ने श्री 420 की इन धुनों को सजाया, जबकि शैलेंद्र और हसरत जयपुरी ने इन्हें अपने शब्दों से संवारा। मुकेश, लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar), मन्ना डे, मोहम्मद रफी (Mohammed Rafi) और आशा भोंसले (Asha Bhosle) की आवाजों ने इन्हें अमर बना दिया। यह सिनेमा इतिहास की उन चुनिंदा फिल्मों में से एक है, जहां कोरस गाने वाले कलाकारों को भी बकायदा पर्दे पर श्रेय दिया गया।
