20 अगस्त से शुरू होने जा रहा है जागरण फिल्म फेस्टिवल, दिल्ली के 'दिल' जनपथ में 4 दिन लगेगा सिनेमा का मेला
72 से अधिक देशों की कहानियों, एआइ तकनीक और महानायकों की विरासत को जीने का उत्सव बन कर आ रहा है 20 अगस्त से शुरु हो रहा जागरण फिल्म फेस्टिवल का 14वां संस्करण। चार दिनों तक क्या कुछ होने वाला है दिल्ली के दिल जनपथ में।

जागरण फिल्म फेस्टिवल 2026/ फोटो- Imdb
HighLights
20-23 अगस्त 2026 को दिल्ली में होगा जागरण फिल्म फेस्टिवल
'डोंट लव सिनेमा, लिव इट' है इस बार की मुख्य थीम
वी. शांताराम और राजकुमार को विशेष श्रद्धांजलि दी जाएगी
मनीष त्रिपाठी, नई दिल्ली। अक्सर जब हम सिनेमा की बात करते हैं, तो हमारे जेहन में करोड़ों रुपये का बिजनेस या थियेटर्स की सीटियां गूंजने लगती हैं। लेकिन सिनेमा का एक और कोना है, वह जो चुपचाप हमारी जिंदगी में दाखिल होता है और हमें खुद से रूबरू करा देता है।
आगामी 20 से 23 अगस्त 2026 तक दिल्ली का डा. आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर इसी रूहानी सिनेमा का गवाह बनने जा रहा है। जागरण फिल्म फेस्टिवल इस बार केवल फिल्में दिखाने नहीं आ रहा, बल्कि अपनी थीम के जरिए एक तकाजा कर रहा है-डोंट लव सिनेमा, लिव इट-यानी सिनेमा को सिर्फ दर्शक बनकर मत देखिए, इसके सुख-दुख को अपने भीतर महसूस कीजिए।
वैश्विक खिड़की पर देसी मन
आज जब ओटीटी के दौर में हर हाथ में स्क्रीन है, तब किसी फिल्म फेस्टिवल की सार्थकता इस बात में है कि वह हमें क्या नया दे रहा है। इस बार जागरण फिल्म फेस्टिवल की टोकरी में 72 से अधिक देशों की 2000 से ज्यादा प्रविष्टियों में से छनकर आई कहानियां हैं।
यह देखना दिलचस्प होगा कि जब 22 भारतीय भाषाओं का मिजाज, दुनिया की 65 अंतरराष्ट्रीय भाषाओं से टकराएगा, तो संवेदनाओं का कैसा साझा संसार रचेगा। इस बार जेएफएफ का कंट्री पार्टनर रोमानिया है। पूर्वी यूरोप के इस देश का सिनेमा हमेशा से अपनी कड़वी सच्चाइयों और बेहतरीन शिल्प के लिए जाना जाता रहा है।
अतीत के महानायकों को नमन
कोई भी नया सिनेमा तब तक अपनी जड़ें मजबूत नहीं कर सकता, जब तक वह अपने अतीत को नमन न करे। जागरण फिल्म फेस्टिवल इस मायने में समृद्ध है कि यह हमें अपनी विरासत की उंगली पकड़ना सिखाता है। इस साल हम भारतीय सिनेमा के शिल्पकार वी. शांताराम की 125वीं जयंती मना रहे हैं, जिनकी 'दो आंखें बारह हाथ' आज भी समाज सुधार और सिनेमाई अनुशासन का सबसे बड़ा पाठ है।

वहीं, 'जानी' के संवादों से दशकों तक थियेटर गुंजाने वाले राजकुमार की जन्मशताब्दी पर 'नीलकमल', 'वक्त' और 'काजल' के बहाने उस दौर के स्टारडम को याद किया जाएगा, जहां अभिनय में एक खास किस्म की ठसक और गरिमा होती थी।
रजत जयंती का यथार्थवादी पाठ
समय की सुइयां कितनी तेजी से घूमती हैं, इसका अहसास तब होता है जब हमें पता चलता है कि मधुर भंडारकर की 'चांदनी बार' और आशुतोष गोवारिकर की 'लगान' को आए 25 साल हो चुके हैं। ये दोनों फिल्में दो अलग-अलग छोरों पर खड़ी थीं; एक मुंबई के बार की स्याह हकीकत बयां कर रही थी, तो दूसरी ग्रामीण भारत के आत्मसम्मान को आस्कर के दरवाजे तक ले गई थी।
फेस्टिवल में इन दोनों फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग युवाओं को यह समझने का मौका देगी कि व्यावसायिकता के बीच रहते हुए भी कालजयी सिनेमा कैसे गढ़ा जाता है। इसके साथ ही धर्मेंद्र, आशा भोसले, असरानी और सतीश शाह जैसी हस्तियों को याद करना इस उत्सव को और भावुक बनाता है।

कड़वे सच से आंखें मिलाना
फेस्टिवल का उद्घाटन सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव करेंगे और माहौल में सुर घोलेंगी रिकी केज की 'एम्पैथी' (समानुभूति) की धुन। गायत्री एकनाथ पाटिल और आदित्य घनश्याम राठी की 'शिकायतें' जैसी उद्घाटन फिल्म के जरिए जावेद जाफरी और सयानी गुप्ता उन पारिवारिक और सामाजिक संवादों को कुरेदेंगे, जिन्हें हम अक्सर ड्राइंग रूम के कालीन के नीचे दबा देते हैं। समापन मयूर पुरी की 'लास्ट एंड फाउंड कुंभ' से होगा, जो भारत और यूके के साझा प्रयासों से बनी है और आस्था के सबसे बड़े मानवीय मेले की अनसुनी मानवीय कहानियां कहती है।
बहसों के बीच सुलगते सवाल
जागरण फिल्म फेस्टिवल की यह विशेषता रही है कि इसकी बैठकी फिल्मों के भीतर छिपे समाजशास्त्र को टटोलती है। यकीनन इस बार भी फेस्टिवल के टाक-शो तीखे सवाल दागेंगे। मौसमी चटर्जी, बाबी देओल, तापसी पन्नू तो अलग-अलग सत्रों में अपनी बातें-अपने किस्से सुनाएंगे ही मगर जब सुधीर मिश्रा और मधुर भंडारकर 'द प्राइस आफ ट्रुथ: सिनेमा, सोसाइटी एंड द स्टोरीज इंडिया डजंट वांट टू हियर' पर बैठेंगे, तो जाहिर है कि बात सेंसरशिप, बाजार के दबाव और फिल्मकार की रीढ़ पर होगी।
वहीं, अपर्णा पुरोहित और शीबा चड्ढा के बीच होने वाली बहस 'शी इज द न्यू आर्किटेक्ट आफ इंडियन सिनेमा, इज शी?' इस बात की पड़ताल करेगी कि परदे के पीछे और आगे महिलाओं की स्थिति में जो बदलाव दिख रहा है, वह वास्तविक है या केवल कारपोरेट पीआर का हिस्सा!

मशीन और मनुष्य का द्वंद्व
इस साल जागरण फिल्म फेस्टिवल का सबसे आधुनिक और शायद थोड़ा डराने वाला हिस्सा है 'एआइ फिल्म मेकिंग वर्कशाप'। एरिना एनिमेशन के इस सत्र में लोग लैपटाप लेकर आएंगे और कुछ ही घंटों में तकनीक के सहारे अपनी पहली फिल्म बना लेंगे।
लेकिन यहीं पर थिएटर के उस्ताद मकरंद देशपांडे और दानिश इकबाल 'द लास्ट ह्यूमन स्टेज' सत्र में एक बुनियादी सवाल उठाएंगे कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कभी इंसानी अहसासों, आंसुओं और हमारी कमियों से उपजी कला की बराबरी कर पाएगी? तकनीक की बेतहाशा बढ़त के इस दौर में मानवीय संवेदना की रक्षा का यह विमर्श बेहद जरूरी है।
नई पौध को प्रोत्साहन
अक्सर मुंबई को ही सिनेमा का मक्का मान लिया जाता है, लेकिन दिल्ली की गलियों और नुक्कड़ नाटकों से जो प्रतिभाएं निकलती हैं, वे भी तो मुंबई का मिजाज बदल देती हैं। सो यह फेस्टिवल इस बार दिल्ली के युवाओं के लिए केवल थियेटर की सीट नहीं दे रहा, बल्कि मुकेश छाबड़ा और टेस जोसेफ जैसे दिग्गज कास्टिंग डायरेक्टर्स के साथ सीधे संवाद का मंच दे रहा है।
इसके अलावा 'जेएफएफ अनटाइटल्ड शार्ट फिल्म ग्रांट' के तहत नए निर्देशकों को 1 लाख रुपये की मदद देना यह साबित करता है कि यह उत्सव अब नई पौध को प्रोत्साहित करने का भी मंच है। तो अब देर किस बात की; शेड्यूल वेबसाइट पर है, सीट बुक कीजिए और सिनेमा को जीकर देखिए!

