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माता-पिता के झगड़ों में खो जाती 'पुतुन' की कहानी ने दर्शकों को झकझोरा, पेरेंट्स को समझना होगा जरूरी

Updated: Sun, 12 Jul 2026 09:03 AM (IST)

जागरण फिल्म फेस्टिवल में 'पुतुन' फिल्म ने माता-पिता के झगड़ों के बच्चों पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव को संवेदनशील तरीके से दिखाया।

दैनिक जागरण के जागरण फिल्म फेस्टिवल (जेएफएफ) के तहत शनिवार को नोएडा फेज 2 स्थित एक्का इलेक्ट्रानिक्स में फिल्म पुतुल देखते अधिकारी और कर्मचारी। जागरण

दैनिक जागरण के जागरण फिल्म फेस्टिवल (जेएफएफ) के तहत शनिवार को नोएडा फेज 2 स्थित एक्का इलेक्ट्रानिक्स में फिल्म पुतुल देखते अधिकारी और कर्मचारी। जागरण

HighLights

  1. 'पुतुन' फिल्म ने माता-पिता के झगड़ों का बच्चों पर असर दिखाया।

  2. फिल्म में सात साल की बच्ची पुतुन की मार्मिक कहानी प्रस्तुत की गई।

  3. जागरण फिल्म फेस्टिवल में पारिवारिक रिश्तों की नाजुकता पर जोर दिया गया।

जागरण संवाददाता, नोएडा। माता-पिता के झगड़ों के बीच बच्चे अपना बचपन और खुद को खो रहे हैं। कुछ ऐसा ही सात वर्ष की मासूम बच्ची पुतुन के साथ हुआ।

नोएडा में फेज-2 स्थित एक्का इलेक्ट्रोनिक्स फैक्ट्री के सभागार में जेएफएफ (जागरण फिल्म फेस्टिवल) में ऐसी फिल्म ने सबका ध्यान खींचा, जिसने घरेलू कलह की सच्चाई को बिना किसी शोर-शराबे, बेहद संवेदनशील तरीके से पेश किया। फिल्म ‘पुतुन’ का स्क्रीनिंग होते ही सभागार में सन्नाटा छा गया और अंत में कई दर्शकों की आंखें नम हो गईं।

माता-पिता के झगड़ों को देखती है बच्ची

फिल्म की कहानी का केंद्र सात वर्ष की मासूम पुतुन है। नाजुक उम्र की यह बच्ची रोजाना अपने माता-पिता के बीच बढ़ते तनाव, झगड़े और आरोप-प्रत्यारोप को देखती है। निर्देशक ने बेहद नाजुक कैमरा वर्क और न्यूनतम संवादों के जरिए दिखाया है कि कैसे मां-बाप की लड़ाई में बच्ची धीरे-धीरे खुद को भूलने लगती है।

स्कूल से पुतुन को मेरा घर शीर्षक पर कहानी लिखने के लिए होम वर्क मिलता है। पुतिन इस होम वर्क में अपने घर पर होने वाली रोज की कलह। माता-पिता के बीच होने वाले झगड़े में संवाद, यहां तक कि दोनों के बीच झगड़े में बोले जाने वाली अशोभनीय भाषा को लिखती है। वह अपनी पसंद, अपनी खुशियां और यहां तक कि अपने माता-पिता से ही दूर जाने के लिए घर छोड़ देती है।

बच्ची जब दूर जाती है तो माता-पिता को उनकी गलती का एहसास होता है। इन पूरी कहानी में पुतुन के नानू और घर छोड़ने के बाद उसको मिलीं दो महिलाओं ने पुतुन के प्रति प्यार से उसका दिल जीता।

ज्यादातर घरों की कहानी कुछ ऐसी ही

फिल्म में पुतुन के अकेलेपन, उसके खिलौनों से बात करने और अपनी दुनिया में सिमट जाने के दृश्य इतने सशक्त हैं कि लगता है जैसे कोई बच्ची अपनी असल जिंदगी की कहानी सुना रही हो। फिल्म का अंत जरूर शानदार होता है। माता-पिता को अपनी गलती का एहसास होता है। पुतुन को झगड़े से दूर अंत में माता-पिता का प्यार जरूर मिल जाता है। कामगाजी लोगों के बीच ज्यादातर घरों की कहानी कुछ ऐसी ही है।

माता-पिता अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। माता-पिता बच्चों की मानसिक स्थिति को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। जब समझते हैं तो काफी देर हो चुकी होती है।

पुतुन फिल्म न सिर्फ पारिवारिक रिश्तों की नाजुकता को उजागर करती है बल्कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर घरेलू कलह के दीर्घकालिक प्रभाव की भी तस्वीर पेश करती है।

पर्दों तक नहीं पहुंच पातीं यह कहानियां

पर्दे तक नहीं पहुंच पाने वाली कहानियों को जागरण फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाता है। सिनेमा सभी के लिए है। जागरण फिल्म फेस्टिवल का उद्देश्य यही है कि सिनेमा सभी के पास बेहतर और प्रेरणादायक कहानियों के रूप में पहुंचे।

यह भी पढ़ें- जागरण फिल्म फेस्टिवल: अच्छी थीम और बेहतर प्रस्तुतीकरण पर हो जोर, छोटे सांस्कृतिक केंद्रों को मिले बढ़ावा

समाज की सच्चाई को फिल्म में बेहतर दर्शाया गया है। बच्चों के जीवन पर माता-पिता के कामकाज का प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। यह हर परिवार को समझना चाहिए। - प्रवीण गोयल, सीईओ एक्का इलेक्ट्रॉनिक्स

परिवार के नैतिक मूल्य होते हैं। यह बने रहने चाहिए। मूवी में पुतुन की कहानी को देखा बहुत बुरा लगा। किसी मासूम के जीवन पर ऐसा प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। - सचिन सैनी

रिश्तों को बनाने के लिए झुकना पड़ता है। झगड़े में किसी एक को झुकना चाहिए। इस झगड़े में बच्चों को न तो शामिल करना चाहिए और न ही उनके सामने किसी तरह की बात करनी चाहिए। - प्रवीण नेगी

मूवी अच्छी है और पारिवारिक जीवन को अच्छी सीख देती है। दैनिक जागरण को यह मूवी हर परिवार और व्यक्ति को दिखानी चाहिए। यह सकारात्मक बदलाव लाएगा। - रौकी तोमर

झगड़ा हर किसी के बीच होता है लेकिन समय पर सुलझाया जाना चाहिए। सभी के साथ मूवी देखकर अच्छा लगा। पुतुन का अभिनय समाज को सकारात्मक संदेश देता है। - इशा गोयल

सिनेमा समाज का आइना होता है। इससे संदेश अच्छा जाना चाहिए। फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीनिंग के लिए पुतुन मूवी अच्छी चुनी गई है। यह हर परिवार को बेहतर संदेश देती है। - रिया चौहान

परिवार में मेरे और पत्नी के साथ ढाई साल की बेटी भी है। बेटी के आने के बाद हम दोनों ने अपने आप को बहुत बदल लिया है। घर में सिर्फ सकारात्मकता है। - रजनीश पांडेय

पुतुन की कहानी एनसीआर में ज्यादातर बच्चों के इर्द गिर्द घूमती है। आपसी झगड़ों में बच्चों की मानसिक स्थिति को समय पर नहीं समझा तो परिणाम खराब होंगे। - पारस