‘लड्डू गोपाल ने बचाया...लगा बादल फट गया...फिर बिस्तर पर गिरने लगे पत्थर’; सत्य निकेतन हादसे की आंखोंदेखी कहानी
सत्य निकेतन में इमारत गिरने के खौफनाक मंजर को पास के गर्ल्स हॉस्टल में रहने वाली तीन छात्राओं ने बयां ...और पढ़ें

सत्य निकेतन में धराशायी हुई इमारत के साथ वाली बिल्डिंग में रहने वाली छात्रा अर्णिता और मानसी। जागरण
HighLights
जोरदार धमाके के साथ गिरी इमारत, लगा बादल फटा।
बिस्तर पर पत्थर गिरे, दीवार से गाद भरा पानी आया।
छात्राएं जान बचाकर भागीं, बचाओ-बचाओ की आवाजें गूंजीं।
विपिन शर्मा, नई दिल्ली। छुट्टी का दिन था। हम लोग आराम से बैठकर बातें कर रहे थे और मोबाइल चलाते हुए शाम को कहां घूमने जाएंगे यह प्लान बना रहे थे। अचानक जोरदार आवाज आई और लाइट चली गई। हमें लगा बादल फटा है। इसी बीच कुछ पत्थर भरभराकर बिस्तर पर गिरे और कमरे की दीवार से गाद भरा पानी आने लगा। जैसे-तैसे बाहर आए तो सिर्फ धूल का गुबार देखने को मिला। लोग बचाओ-बचाओ चिल्ला रहे थे। दैनिक जागरण से बातचीत में हादसे का यह खौफनाक मंजर बयां किया गिरने वाली इमारत से सटी बिल्डिंग में रहनी वाली छात्राओं ने।
रिश्तेदारों के यहां ली पनाह
सत्य निकेतन में दो दिन पहले ब्वाॅजय डेज की जमींदोज हुई इमारत के साथ वाली बिल्डिंग में गर्ल्स हास्टल था। हादसे के बाद तीसरी मंजिल में रहने वालीं तीन छात्राओं ने जैसे-तैसे जान बचाई। रिश्तेदारों के यहां रह रहीं तीनों छात्राएं मंगलवार को अपना सामान लेने वापस पहुंची।
अब भी सुनाई दे रही बचाओ-बचाओ की आवाज
गोरखपुर की रहने वाली मानसी मैत्रेयी काॅलेज में बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा है। उन्होंने बताया कि अपनी दोस्त नेहा के साथ दोपहर को बैठकर बातें कर रही थीं। अचानक जोरदार धमाके की आवाज आई और लगा बादल फटा है।
मैत्रेयी कहती हैं, 'इसी बीच लाइट चली गई, बिस्तर पर पत्थर गिरने लगे और पत्थर गिरने से बने बड़े छेद से धूल और गाद भरा पानी अंदर आने लगा। कुछ नहीं सूझा तुरंत सब छोड़कर हम नीचे भागे। बाहर निकले तो चारों तरफ धूल का गुबार था और लोग बचाओ-बचाओ चिल्ला रहे थे।
वहीं, भावुक होते हुए मानसी ने कहा, 'अभी भी वो बचाओ-बचाओ की आवाजें कानों में गूंज रही हैं।
मेरे लड्डू गोपाल ने बचाई जान...
असम की रहने वाली अर्णिता श्री वेंकटेश्वर काॅलेज की छात्रा हैं। उन्होंने बताया कि हादसे के समय लड्डू गोपाल के सामने बैठी थीं। अचानक तेज आवाज आई और लगा भूकंप आया है। कुछ समझ आता इससे पहले दीवार का एक हिस्सा गिर गया। कुछ नहीं सूझा, तो तुरंत लड्डू गोपाल को उठाया और साथ वाले रूम में रहने वालीं मानसी और नेहा के साथ नीचे भागी।
'आज हिम्मत कर सामान लेने आई'
उन्होंने आगे बताया कि गेट का सेंट्रल लाॅक कई बार कोशिश करने पर भी नहीं खुला। लड्डू गोपाल का नाम लेकर कोशिश की और सातवीं बार में गेट खुला लेकिन सामने मलबा फैला हुआ था। जैसे-तैसे हम लोग बाहर आए। गली में धूल के गुबार के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। वह मंजर याद कर आज भी कांप जाती हूं। आज जैसे-तैसे हिम्मत करके सामान लेने आई हूं।
