‘रेड’ से ‘ब्लू’ श्रेणी में किए गए दिल्ली के WTE प्लांट, विश्लेषण में प्रदूषण सूचकांक 100; निगरानी पर सवाल
दिल्ली के चार कचरा-से-बिजली संयंत्रों को 'रेड' से 'ब्लू' श्रेणी में रखने पर एक नए विश्लेषण में सवाल उठाए गए ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।
HighLights
दिल्ली के चार डब्ल्यूटीई संयंत्रों का प्रदूषण सूचकांक 100।
'रेड' से 'ब्लू' श्रेणी में बदलने पर सीएफए ने उठाए सवाल।
'ब्लूवॉशिंग' से पर्यावरण निगरानी कमजोर होने का खतरा।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। कचरे से बिजली बनाने वाले दिल्ली के चार संयंत्रों को ‘रेड’ से हटा ‘ब्लू’ श्रेणी में रखने के फैसले पर एक नए विश्लेषण में सवाल उठाए गए हैं।
सेंटर फार फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी (सीएफए) के सितंबर 2026 के इस विश्लेषण के मुताबिक, ओखला, गाजीपुर, नरेला-बवाना और तेहखंड स्थित चारों कचरा-से-बिजली (डब्ल्यूटीई) संयंत्रों का संयुक्त प्रदूषण सूचकांक 100 में से 100 है। इसका मतलब है कि इन संयंत्रों का प्रदूषण स्तर काफी अधिक है।
प्रदूषण सूचकांक किसी उद्योग से होने वाले प्रदूषण के स्तर को मापने का एक पैमाना है। इसमें शून्य से 100 तक अंक दिए जाते हैं। अंक जितने अधिक होते हैं, प्रदूषण का स्तर उतना ही ज्यादा माना जाता है।
विश्लेषण में कहा गया है कि 80 या उससे अधिक अंक वाले उद्योग रेड श्रेणी में आते हैं। इन पर कड़ी निगरानी, नियमित जांच और लगातार उत्सर्जन की निगरानी जैसी व्यवस्थाएं लागू होती हैं।
2025 में बदली गई श्रेणी
विश्लेषण के मुताबिक, जनवरी 2025 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने उद्योगों की श्रेणी तय करने की व्यवस्था में ‘ब्लू’ नाम की नई श्रेणी बनाई।
इस श्रेणी में उन संस्थानों को रखा गया जिन्हें घरों से निकलने वाले कचरे के प्रबंधन के लिए ‘जरूरी पर्यावरणीय सेवा’ माना गया। इसके बाद पहले रेड श्रेणी में आने वाले डब्ल्यूटीई संयंत्रों को ब्लू श्रेणी में शामिल कर दिया गया।
सीएफए ने इस बदलाव पर सवाल उठाते हुए कहा है कि ब्लू श्रेणी में आने वाले संयंत्रों को अपने प्रदूषण सूचकांक का खुद आकलन करना होता है। विश्लेषण के अनुसार, इससे प्रदूषण की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े होते हैं।
कचरा जलाने से कई तरह का प्रदूषण
विश्लेषण में कहा गया है कि नगर निगम के कचरे को जलाने से कई तरह के प्रदूषण होते हैं। इसमें जहरीली गैसों के साथ डाइआक्सिन और भारी धातुओं जैसे प्रदूषक शामिल हैं। इसके साथ- साथ कचरे से निकलने वाला गंदा पानी, राख को ठंडा करने के दौरान निकलने वाला पानी और अन्य औद्योगिक अपशिष्ट भी प्रदूषण का कारण बनते हैं।
कचरा जलाने के बाद बड़ी मात्रा में राख भी बचती है, जिसे खतरनाक अपशिष्ट माना जाता है और इसके सुरक्षित निस्तारण की जरूरत होती है।
सीएफए ने अपने विश्लेषण में दिल्ली के चारों डब्ल्यूटीई संयंत्रों से जुड़े प्रदूषण आंकड़ों के लिए सीपीसीबी के तकनीकी दस्तावेजों और एनजीटी तथा सुप्रीम कोर्ट में जमा कराए गए दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है।
सीपीसीबी के आंकड़े से भी अलग दावा
विश्लेषण के मुताबिक, चारों संयंत्रों का संयुक्त प्रदूषण सूचकांक 100 है, जबकि सीपीसीबी के आंकड़े में यह 97.6 है। रिपोर्ट का दावा है कि 100 का आंकड़ा इन संयंत्रों के प्रदूषण की अधिकतम सीमा को दर्शाता है।
विश्लेषण में यह भी दावा किया गया है कि डब्ल्यूटीई संयंत्र प्रति इकाई बिजली उत्पादन में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की तुलना में 68 प्रतिशत अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करते हैं।
सीएफए ने इन संयंत्रों को ‘ब्लू’ श्रेणी में रखे जाने को ‘ब्लूवाशिंग’ बताते हुए कहा है कि इससे पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए जरूरी निगरानी और सुरक्षा उपाय कमजोर हो सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कचरे का निस्तारण जरूरी होने के बावजूद उससे बिजली बनाने की प्रक्रिया के प्रदूषण और खतरनाक कचरे से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
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