टिहरी बांध के जलाशय में आता है 88 मीटर तक का उतार-चढ़ाव, ISRO ने सेटेलाइट अध्ययन के बाद बयां की हकीकत
इसरो के अध्ययन से पता चला है कि टिहरी बांध के जलाशय में 88 मीटर तक का असामान्य जलस्तर उतार-चढ़ाव होता है, जबकि रामगंगा में यह 21.5 मीटर है। वैज्ञानिको ...और पढ़ें

टिहरी बांध के जलाशय में आता है 88 मीटर तक का भारी उतार-चढ़ाव।
HighLights
टिहरी जलाशय में 88 मीटर तक का जलस्तर उतार-चढ़ाव।
इसरो के अध्ययन ने टिहरी के प्रबंधन पर जोर दिया।
रामगंगा में 21.5 मीटर का अपेक्षाकृत कम उतार-चढ़ाव।
सुमन सेमवाल, देहरादून। उत्तराखंड के टिहरी और रामगंगा जलाशयों में पानी के उतार-चढ़ाव का अंतरिक्ष से विस्तृत आकलन किया गया है। इसमें पता चला कि टिहरी बांध के जलाशय में सर्वाधिक 88 मीटर (समुद्र तल से) का उतार-चढ़ाव पाया जा रहा है। इसे असामान्य मानते हुए प्रबंधन की दिशा में काम करने की संस्तुति की गई है।
इसरो के भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (आईआईआरएस), देहरादून के इस अध्ययन को 08 मई 2026 को सार्वजनिक किया गया। अध्ययन के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस के संयुक्त उपग्रह मिशन एसडब्ल्यूओटी के आंकड़ों को आधार बनाया गया। टिहरी और रामगंगा बांध के अध्ययन में अगस्त 2023 से फरवरी 2026 तक के आंकड़ों को शामिल किया गया।
विज्ञानियों ने दोनों जलाशयों को इसलिए चुना, क्योंकि उनकी भौगोलिक बनावट अलग है। रामगंगा जलाशय अपेक्षाकृत चौड़े और समतल भूभाग में स्थित है, जहां मानसून के दौरान आने वाले पानी से जलक्षेत्र का फैलाव भी बढ़ता है।
इसके विपरीत टिहरी जलाशय खड़ी हिमालयी घाटियों के बीच संकरी और लंबी आकृति में फैला है। यहां जटिल स्थलाकृति और जलाशय के संचालन का जलस्तर पर अधिक स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
अध्ययन में पूरे आंकड़ा सेट को तीन मौसमी अवधियों में बांटा गया। मानसून पूर्व मार्च से मई, मानसून में जून से सितंबर और मानसून पश्चात अक्टूबर से फरवरी। दोनों जलाशयों में मानसून के दौरान और उसके बाद जलस्तर बढ़ने की प्रवृत्ति मिली।
इसके पीछे वर्षा और जलग्रहण क्षेत्र से आने वाला पानी प्रमुख कारण सामने आया। इसके विपरीत मानसून से पहले पानी धीरे-धीरे घटता है। विज्ञानियों ने इसके पीछे वाष्पीकरण, जल प्रवाह में कमी और जलाशय के उपयोग को प्रमुख कारण बताया है। दोनों जलाशयों में सबसे ऊंचा जलस्तर सामान्यतः अक्टूबर से दिसंबर के बीच मिला।
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रामगंगा में 21.5 मीटर का उतार-चढ़ाव
रामगंगा जलाशय में जलस्तर में बदलाव अपेक्षाकृत सुचारु और मौसमी चक्र के अनुरूप पाया गया। अध्ययन अवधि में इसका अधिकतम जलस्तर अक्टूबर 2025 में समुद्र तल से करीब 364.43 मीटर और न्यूनतम जुलाई 2025 में करीब 342.9 मीटर दर्ज हुआ। अध्ययन अवधि का औसत जलस्तर लगभग 354.43 मीटर रहा और कुल उतार-चढ़ाव करीब 21.5 मीटर था। वर्ष 2025 में रामगंगा में मौसमी परिवर्तनशीलता सबसे अधिक रही।
जून में जलस्तर करीब 334.5 मीटर तक घटने के बाद मानसून के दौरान तेजी से पुनर्भरण हुआ और अक्टूबर से दिसंबर के बीच जलाशय में उच्च भंडारण की स्थिति बनी। अध्ययन में मानसून पश्चात महीनों को अपेक्षाकृत स्थिर पाया गया, जबकि मई से जुलाई के बीच सबसे अधिक उतार-चढ़ाव रहा। अधिक पानी की स्थिति में रामगंगा का जलक्षेत्र क्षैतिज रूप से भी अधिक फैलता है, जिसका संबंध उसके अपेक्षाकृत चौड़े भूभाग से है।
टिहरी में 88.3 मीटर तक बदला जलस्तर
टिहरी जलाशय में उतार-चढ़ाव रामगंगा की तुलना में कहीं अधिक पाया गया। अध्ययन के अनुसार यहां अधिकतम जलस्तर नवंबर 2024 में समुद्र तल से करीब 833.40 मीटर और न्यूनतम मई 2024 में करीब 745.1 मीटर रहा। अध्ययन अवधि में औसत जलस्तर लगभग 790.21 मीटर और कुल उतार-चढ़ाव करीब 88.3 मीटर दर्ज किया गया।
विज्ञानियों के अनुसार टिहरी बांध के जलस्तर में यह बड़ा अंतर उसके खड़ी और संकरी घाटी वाले भूगोल, जलाशय की भंडारण संरचना और जलाशय के नियमन से जुड़ा है। यहां पानी का क्षैतिज फैलाव अपेक्षाकृत सीमित रहता है, लेकिन जल की सतह की ऊंचाई में बदलाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। खासतौर पर 2024-25 के शुष्क मौसम में जलाशय के जलस्तर में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
वैज्ञानिकों ने बताई सावधानी बरतने की जरूरत
अध्ययन में टिहरी जलाशय में कई बार बेहद कम जलस्तर भी दर्ज हुआ। इनमें नवंबर 2023 में 690.41 मीटर और जनवरी 2025 में 662.26 मीटर के आंकड़े शामिल हैं। आईआईआरएस ने असामान्य रूप से बेहद कम हुए जलस्तर को आंकड़ों की विसंगति या जलाशय के संचालन से जुड़े प्रभाव की संभावना से जोड़ा। इसलिए इन्हें सामान्य जलस्तर का प्रतिनिधि मानकर निष्कर्ष निकालने के बजाय सावधानी से देखने की जरूरत बताई गई है।