IIT रुड़की व FRI का बड़ा खुलासा: पश्चिमी हिमालय में 1°C तापमान बढ़ने से होंगी 112 अतिरिक्त जंगल में आग की घटनाएं
शोध में पाया गया कि पश्चिमी हिमालय में वार्षिक तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि से 112 अतिरिक्त वनाग्नि की घटनाएं हो सकती हैं। ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर।
HighLights
एक डिग्री तापमान वृद्धि से 112 अतिरिक्त वनाग्नि घटनाएं
आईआईटी रुड़की और वन अनुसंधान संस्थान का संयुक्त शोध
मानवीय गतिविधियां और सूखा मौसम आग के मुख्य कारण
जागरण संवाददाता, देहरादून। जलवायु परिवर्तन अब केवल भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि पश्चिमी हिमालय के जंगलों में दिखाई देने वाली वास्तविकता बन चुका है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) रुड़की और वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून के विज्ञानियों की ओर से किए गए शोध में पाया गया कि औसत वार्षिक तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि के साथ पश्चिमी हिमालय में औसतन 112 अतिरिक्त वनाग्नि की घटनाएं हो सकती हैं।
यदि केवल गर्मियों के औसत तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है, तो यह संख्या बढ़कर 128 अतिरिक्त घटनाओं तक पहुंच सकती है।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ट्रीज, फारेस्ट एंड पीपुल में प्रकाशित किया गया है। आइआइटी रुड़की के विज्ञानी अखिल सिंह चरक के नेतृत्व में विज्ञानियों ने वर्ष 2013 से 2022 के बीच पश्चिमी हिमालय में दर्ज 18,645 वनाग्नि की घटनाओं का विश्लेषण किया।
अध्ययन का क्षेत्र उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख तक फैला था। उद्देश्य यह जानना था कि आखिर किन कारणों से जंगलों में आग लगती है और कौन से कारक इस खतरे को सबसे अधिक बढ़ाते हैं।
39 कारकों की जांच, 13 सबसे महत्वपूर्ण निकले
शोध में कुल 39 विभिन्न कारकों का परीक्षण किया गया। इनमें जलवायु, भौगोलिक स्थिति, वनस्पति, मिट्टी और मानव गतिविधियों से जुड़े संकेतक शामिल थे।
इनमें से 13 जैव-जलवायु (बायोक्लाइमेटिक) कारक वनाग्नि की घटनाओं को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारक पाए गए। विज्ञानियों के अनुसार, बढ़ता तापमान जंगल की नमी को तेजी से कम करता है।
जब पत्तियां, घास, चीड़ की सूखी सुइयां और अन्य जैविक पदार्थ सूख जाते हैं, तो वे मामूली चिंगारी से भी आग पकड़ लेते हैं। गर्म मौसम में मिट्टी और वनस्पति दोनों तेजी से सूखते हैं, जिससे आग लगने और फैलने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
मानव गतिविधियों की भूमिका भी बड़ी
शोध के अनुसार जिन क्षेत्रों में सड़कें, बस्तियां और अन्य मानव गतिविधियां अधिक हैं, वहां वनाग्नि का जोखिम भी अधिक पाया गया। इसका कारण यह है कि अधिकांश आग प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही, कृषि अवशेष जलाने, कैंप फायर, सिगरेट या अन्य गतिविधियों से शुरू होती है।
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बढ़ा हुआ तापमान इन छोटी घटनाओं को बड़ी वनाग्नि में बदल देता है। अध्ययन में बताया गया है कि प्री-मानसून (मार्च से जून) का समय सबसे संवेदनशील होता है।
इस अवधि में सर्दियों के बाद जंगलों में बड़ी मात्रा में सूखी जैविक सामग्री जमा रहती है, जबकि तापमान बढ़ जाता है और आर्द्रता घट जाती है। यदि इस दौरान वर्षा और हिमपात सामान्य से कम हो, तो वनाग्नि का खतरा और बढ़ जाता है।