हिमालय में बर्फबारी का आंकलन गलत! दर्ज आंकड़ों से कहीं अधिक हुआ Snowfall
एक नए अध्ययन में पाया गया है कि वैश्विक मॉडल हिमालय में वास्तविक बर्फबारी को काफी कम आंक रहे हैं, जिससे जल संसाधन और ग्लेशियरों के आकलन पर गंभीर प्रभा ...और पढ़ें


समय कम है?
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जागरण संवाददाता, देहरादून। जलवायु परिवर्तन और हिमालयी पारिस्थितिकी पर काम कर रहे विज्ञानियों ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन में पाया है कि हिमालय के कई हिस्सों में वास्तविक बर्फबारी वैश्विक मौसम और जलवायु डेटासेट में दर्ज आंकड़ों से कहीं अधिक हो रही है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा वैश्विक माडल हिमालयी क्षेत्रों, विशेषकर पश्चिमी और मध्य हिमालय में होने वाली बर्फबारी को कम आंक रहे हैं, जिससे भविष्य के जल संसाधन प्रबंधन और ग्लेशियरों से जुड़े आकलनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में आइआइटी मंडी, हिमाचल प्रदेश, यूनिवर्सिटी आफ वाशिंगटन, अमेरिका, यूनिवर्सिटी आफ कोलोराडो बोल्डर, अमेरिका, यूनिवर्सिटी आफ ओरेगन, अमेरिका और यूनिवर्सिटी आफ इंसब्रुक, आस्ट्रिया के विज्ञानियों ने किया।
बर्फबारी का सटीक आंकलन चुनौती
अध्ययन के अनुसार, हिमालय जैसे दुर्गम और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फबारी का सटीक आंकलन करना लंबे समय से विज्ञानियों के लिए चुनौती बना हुआ है। अधिकांश वैश्विक माडल उपग्रह आधारित आंकड़ों और सीमित मौसम केंद्रों के डेटा पर आधारित होते हैं, जिसके कारण वास्तविक स्थिति और माडल के अनुमान में बड़ा अंतर सामने आता है। यही कारण है कि कई बार हिमालयी जल चक्र और ग्लेशियरों के भविष्य को लेकर की जाने वाली भविष्यवाणियां पूरी तरह सटीक नहीं हो पातीं।
शोधकर्ताओं ने इस समस्या को दूर करने के लिए उच्च-रेजोल्यूशन वायुमंडलीय माडल विकसित कर उसका परीक्षण पश्चिमी-मध्य हिमालय, यूरोप के आल्प्स पर्वत और अमेरिका के राकी पर्वतों में किया। इस दौरान विज्ञानियों ने दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित जमी हुई झीलों पर जमा होने वाली बर्फ के कारण बनने वाले दबाव परिवर्तन को मापकर बर्फबारी का स्वतंत्र और निष्पक्ष अनुमान तैयार किया। इस नई पद्धति ने पारंपरिक माडलों की तुलना में कहीं अधिक सटीक परिणाम दिए।
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हालांकि, अध्ययन में सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष हिमाचल प्रदेश के मनाली क्षेत्र और उससे जुड़े पश्चिमी हिमालयी हिस्सों में सामने आया। विज्ञानियों ने पाया कि पहले उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ वैश्विक विश्लेषणों ने केवल एक सर्दी के मौसम में ही कुल मौसमी बर्फबारी को लगभग 37 प्रतिशत तक कम आंका था। नए अवलोकनों और सेंसर आधारित आंकड़ों को शामिल करने के बाद इस त्रुटि में उल्लेखनीय कमी आई।
दर्शाए गए आंकड़ों से काफी अधिक बर्फ जमा
नई गणनाओं के अनुसार, पश्चिमी हिमालय के कुछ हिस्सों में एक मौसम के दौरान प्रति वर्ग मीटर 800 किलोग्राम से अधिक बर्फ जमा हुई, जो पारंपरिक वैश्विक डेटासेट में दर्शाए गए आंकड़ों से काफी अधिक है। विज्ञानियों का कहना है कि यह अंतर केवल सांख्यिकीय नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिमालय से निकलने वाली नदियों पर करोड़ों लोगों की पेयजल, सिंचाई और ऊर्जा आवश्यकताएं निर्भर करती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि बर्फबारी के वास्तविक आंकड़ों का सही आकलन नहीं किया गया तो ग्लेशियर पिघलने की दर, नदी प्रवाह, जलाशयों की क्षमता और भविष्य के जल संकट संबंधी अनुमान प्रभावित हो सकते हैं। यही नहीं, ग्लेशियर झील विस्फोट, अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं के जोखिम का आकलन भी गलत साबित हो सकता है।
विज्ञानियों ने इस अध्ययन के आधार पर हिमालयी क्षेत्रों में अधिक घनत्व वाले मौसम निगरानी नेटवर्क, आधुनिक सेंसरों और स्थानीय स्तर पर डेटा संग्रह प्रणालियों के विस्तार की आवश्यकता पर बल दिया है। उनका मानना है कि वैश्विक जलवायु माडलों और स्थानीय वास्तविकताओं के बीच मौजूद अंतर को कम किए बिना हिमालयी क्षेत्र के लिए प्रभावी जलवायु अनुकूलन रणनीति तैयार करना संभव नहीं होगा।