देहरादून के दून मेडिकल कॉलेज में फिर आया रैगिंग का मामला, छात्र पर बाल-दाढ़ी काटने का बनाया दबाव
दून मेडिकल कॉलेज में एक बार फिर रैगिंग का गंभीर मामला सामने आया है। 2025 बैच के एक छात्र ने सीनियरों पर बाल और दाढ़ी काटने का दबाव बनाने का आरोप लगाया ...और पढ़ें

दून मेडिकल कालेज।

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जागरण संवाददाता, देहरादून। दून मेडिकल कालेज में रैगिंग पर रोक के तमाम दावों के बावजूद एक बार फिर गंभीर मामला सामने आया है। 2025 बैच के एक छात्र द्वारा लगाए गए आरोपों ने संस्थान की एंटी रैगिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस बार मामला समुदाय विशेष के एक छात्र से जुड़ा है। पीड़ित छात्र ने आरोप लगाया है कि सीनियर छात्रों ने उस पर बाल और दाढ़ी काटने का दबाव बनाया। शिकायत मिलने के बाद कालेज प्रशासन ने मामले की जांच शुरू कर दी है।
कालेज में लगातार सामने आ रहे मामलों से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सख्त कार्रवाई के अभाव में रैगिंग पर अंकुश नहीं लग पा रहा। कालेज में इसी साल जनवरी में भी रैगिंग के प्रकरण सामने आए थे।
एक मामले में एमबीबीएस 2025 बैच के जूनियर छात्र के साथ उसके सीनियर छात्रों ने हिंसक व्यवहार किया। पीड़ित छात्र के अनुसार, उसे बेल्ट और चप्पलों से पीटा गया और जबरन बाल कटवाने का दबाव बनाया गया।
इनता ही नहीं सहपाठी से भी उसकी पिटाई करवाई। जिससे छात्र तनाव में चला गया। जिसके बाद कालेज प्रबंधन ने सीनियर छात्रों के निष्कासन के साथ ही उन पर जुर्माना भी लगाया था।
एक अन्य प्रकरण में जूनियर छात्र ने सीनियर पर अनुचित व्यवहार और दबाव का आरोप लगा एनएमसी को शिकायत भेजी थी। इस मामले में भी दोषी छात्र पर निष्कासन व जुर्माने की कार्रवाई की गई थी। पर रैगिंग की घटनाएं फिर भी थम नहीं रही हैं।
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प्राचार्य डा. गीता जैन ने बताया कि संस्थान में रैगिंग को लेकर जीरो टालरेंस की नीति लागू है। शिकायत के हर पहलू की जांच की जा रही है।
प्रशासन यह पता लगाने में जुटा है कि पीड़ित छात्र पर किसने, कब और किस तरह दबाव बनाया। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
सख्त कार्रवाई के अभाव में बढ़ रहे मामले
राजकीय मेडिकल कालेजों में रैगिंग अब अपवाद नहीं, बल्कि एक दोहराई जाने वाली समस्या बन चुकी है। जूनियर छात्रों के साथ मानसिक उत्पीड़न, अपमानजनक व्यवहार और कई मामलों में शारीरिक हिंसा तक की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
नियमों के अनुसार, रैगिंग एक संज्ञेय अपराध है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों तथा नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) के दिशानिर्देशों के तहत ऐसे मामलों में एफआइआर दर्ज करना अनिवार्य है। लेकिन व्यवहार में अधिकांश मामलों में कालेज प्रशासन आंतरिक जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई तक ही सीमित रह जाता है।
कई बार संस्थान की छवि खराब न हो, इस कारण पुलिस को सूचना देने से भी परहेज किया जाता है। इसी प्रवृत्ति ने रैगिंग को पूरी तरह खत्म करने के प्रयासों को कमजोर किया है।
एंटी रैगिंग कमेटियों की भूमिका भी कई बार औपचारिक रह जाती है। शिकायत के बाद जांच और कुछ छात्रों का निष्कासन या निलंबन कर मामला समाप्त कर दिया जाता है।
क्यों नहीं रुक रही रैगिंग
- एफआइआर से बचने की प्रशासनिक प्रवृत्ति
- सख्त और उदाहरण प्रस्तुत करने वाली सजा का अभाव
- एंटी रैगिंग कमेटियों की कमजोर निगरानी
- विभागीय स्तर पर प्रभावी मानिटरिंग की कमी
- रैगिंग करने वालों में यह धारणा कि अधिकतम सजा कालेज स्तर तक सीमित रहेगी
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