Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    देहरादून में 45 लाख साल पुराने मीठे पानी की मछलियों के जीवाश्म मिले, प्राचीन हिमालयी जलजीवन हुआ उजागर

    Updated: Mon, 06 Apr 2026 11:26 PM (IST)

    देहरादून के पास मोहंड क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने 45-50 लाख साल पुराने प्लायोसीन काल की मीठे पानी की मछलियों के जीवाश्म खोजे हैं। ...और पढ़ें

    देहरादून से लगे शिवालिक क्षेत्र में जीवाश्म की खोज करते वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी निंगथौजम प्रेमजीत सिंह। वहीं, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने खोजे गए 45 लाख साल पुराने मछलियों के जीवाश्म। साभार-वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान

    देहरादून से लगे शिवालिक क्षेत्र में जीवाश्म की खोज करते वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी निंगथौजम प्रेमजीत सिंह। वहीं, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने खोजे गए 45 लाख साल पुराने मछलियों के जीवाश्म। साभार-वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान 

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    जागरण संवाददाता, देहरादून। उत्तराखंड और उत्तर भारत के प्राचीन प्राकृतिक इतिहास को समझने की दिशा में विज्ञानियों को बड़ी सफलता मिली है।

    देहरादून के पास मोहंड क्षेत्र में विज्ञानियों ने करीब 45 से 50 लाख वर्ष पुराने प्लायोसीन काल के मीठे पानी की मछलियों के जीवाश्म खोजे हैं।

    यह खोज न सिर्फ हिमालयी क्षेत्र के प्राचीन जलजीवन को समझने में अहम है, बल्कि यह बताती है कि उस समय यहां शांत झील, तालाब या ठहरा हुआ जलाशय मौजूद था। यह खोज वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निंगथौजम प्रेमजीत सिंह ने की है।

    शोध में सबसे खास बात यह है कि वैज्ञानिकों को मछलियों के ओटोलिथ मिले हैं, जिन्हें आम भाषा में मछली के कान के भीतर मौजूद संतुलन और सुनने में मदद करने वाली छोटी कैल्शियम संरचनाएं कहा जा सकता है।

    इस तरह जीवाश्म तक पहुंची खोज

    वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विज्ञानियों ने मोहंड, सहारनपुर-देहरादून सीमा के शिवालिक क्षेत्र से करीब 500 किलोग्राम तलछट (सेडीमेंट) इकट्ठा कर उसकी लैब में जांच की। इस जांच में कुल 36 जीवाश्म मिले।

    यह जीवाश्म आए सामने

    चन्ना (स्नेकहेड फिश)
    यह वह प्रजाति है जिसे आम बोलचाल में सोल या स्नेकहेड मछली कहा जाता है। यह मछली आज भी भारत के तालाबों और नदियों में पाई जाती है और यह एक शीर्ष शिकारी मानी जाती है।

    ट्राइकोगैस्टर फासियाटा

    यह एक शांत पानी में रहने वाली रंगीन मछली है, जो आज भी भारत में मिलती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसका जीवाश्म मिलना बेहद दुर्लभ है। दुनिया में इस परिवार का यह दूसरा जीवाश्म रिकार्ड है और ओटोलिथ के आधार पर पहला।

    गोबी परिवार की मछली

    यह छोटी आकार की तलहटी में रहने वाली मछली होती है।

    जीवाश्म ने इस तरह खोले जलवायु के राज

    शोध के अनुसार आज का मोहंड-देहरादून क्षेत्र प्लायोसीन काल में संभवतः शांत मीठे पानी की झील, तालाब या दलदली जलाशय रहा होगा।

    विज्ञानियों के अनुसार उस समय संबंधित क्षेत्र में घनी जलीय वनस्पति, उथला और ठहरा हुआ पानी और विविध जलजीवों से भरपूर मीठे पानी की पारिस्थितिकी थी।

    यह खोज सिर्फ मछलियों की मौजूदगी नहीं बताती, बल्कि उस समय के पूरे जल पारिस्थितिकी तंत्र की तस्वीर पेश करती है।

    वरिष्ठ विज्ञानी निंगथौजम प्रेमजीत सिंह के अनुसार जिन मछलियों के जीवाश्म मोहंड क्षेत्र में मिले हैं, वह मछलियां भारत के उत्तर पूर्व (नार्थ ईस्ट) और दक्षिण एशिया में पाई जाती हैं। ये जीवाश्म जलवायु को लेकर नई बहस को जन्म देते भी दिख रहे हैं।

    खबरें और भी

    यह भी पढ़ें- हिंदुकुश हिमालय के 63 हजार ग्लेशियरों पर महासंकट, 30 साल में 12% घटा क्षेत्रफल; पिघलने की रफ्तार दोगुनी

    यह भी पढ़ें- बर्फ पिघलने से बढ़ा संकट: 30 वर्षों में पूर्वी हिमालय से घट गई बर्फ की 30 प्रतिशत परत