Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    बर्फ पिघलने से बढ़ा संकट: 30 वर्षों में पूर्वी हिमालय से घट गई बर्फ की 30 प्रतिशत परत

    Updated: Sun, 15 Mar 2026 02:29 AM (IST)

    हिमालय में जलवायु परिवर्तन से बर्फ तेजी से घट रही है। एक शोध के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में पूर्वी हिमालय की 30% बर्फ पिघल गई है। ...और पढ़ें

    सांकेतिक तस्वीर।

    सांकेतिक तस्वीर।

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    सुमन सेमवाल, देहरादून। हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से दिखाई दे रहा है। एक नए शोध में चेतावनी दी गई है कि अगर मौजूदा गर्मी बढ़ने का सिलसिला जारी रहा, तो सदी के अंत तक हिमालय की करीब 68 प्रतिशत बर्फ (स्नो कवर) समाप्त हो सकती है।

    इससे न सिर्फ हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र, बल्कि दक्षिण और मध्य एशिया के करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा, कृषि और जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित विज्ञानी पत्रिका ‘अर्थ साइंस रिव्यूज’ में प्रकाशित हुआ है।

    शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि कराकोरम क्षेत्र में लगभग 26 प्रतिशत बर्फ 2100 तक गायब हो सकती है। हालांकि, यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से हिमालय के अन्य हिस्सों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक स्थिर रहा है।

    मिजोरम विश्वविद्यालय के शोधकर्ता वरिष्ठ प्रोफेसर विश्वम्भर प्रसाद सती और सुरजीत बनर्जी की ओर से किए गए इस अध्ययन में हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विश्लेषण किया गया है।

    इस पूरे क्षेत्र को अक्सर थर्ड पोल और एशिया का वाटर टावर कहा जाता है। क्योंकि, यहां मौजूद विशाल बर्फ और ग्लेशियर एशिया की कई प्रमुख नदियों को पानी उपलब्ध कराते हैं।

    शोध के मुताबिक वर्ष 1980 से 2020 के बीच इस क्षेत्र का तापमान 40 साल में प्रति दशक 0.2 से 0.3 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ा है, जो वैश्विक औसत से लगभग दोगुना है।

    पूर्वी हिमालय के कई हिस्सों में यह गर्मी और भी तेजी से बढ़ रही है। बढ़ते तापमान और बदलते वर्षा पैटर्न के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और बर्फ की परत घटती जा रही है।

    हर साल 0.37 मीटर पानी के बराबर बर्फ खो रहे ग्लेशियर

    अध्ययन के अनुसार ग्लेशियरों ने वर्ष 2000 से 2016 के बीच हर साल औसतन 0.37 मीटर पानी के बराबर (वाटर इक्यूवेलेंट) बर्फ खोई है। इसका मतलब यह है कि हर साल ग्लेशियरों की मोटाई धीरे-धीरे कम हो रही है।

    मध्य और पूर्वी हिमालय में बर्फ की परत 30 प्रतिशत घट गई

    मध्य और पूर्वी हिमालय में स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है। यहां वर्ष 1990 से 2020 के बीच 30 साल में बर्फ की परत 30 प्रतिशत घट गई है।

    खबरें और भी

    हालांकि, इसके विपरीत कराकोरम क्षेत्र में कुछ स्थानों पर बर्फ की मात्रा अपेक्षाकृत स्थिर या थोड़ी बढ़ती हुई भी देखी गई है।

    विज्ञानी इसे कराकोरम एनोमली कहते हैं, जो पश्चिमी विक्षोभ से मिलने वाली सर्दियों की वर्षा से जुड़ी है।

    ग्लेशियर झीलें बढ़ने से बाढ़ का खतरा

    ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों का आकार और संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) का खतरा बढ़ गया है।

    मध्य हिमालय में ही वर्ष 1977 में 1160 झीलें थीं, जो 2010 तक बढ़कर 2168 हो गईं। पूरे क्षेत्र में 1833 से 2022 के बीच ग्लेशियर झील फटने की 697 घटनाएं दर्ज की गई हैं।

    हिमस्खलन और भूस्खलन का खतरा भी बढ़ा

    शोधकर्ताओं के अनुसार वर्ष 1982 से 2022 के बीच कम से कम 681 बड़े हिमस्खलन दर्ज किए गए, जिनमें 3,100 से अधिक लोगों की मौत हुई। यदि ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति यही रही तो इस तरह की घटनाओं में वृद्धि होगी।

    पिघल रही जमी हुई जमीन

    शोधकर्ताओं के मुताबिक हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों में जमीन के अंदर कई मीटर तक स्थायी रूप से जमी हुई बर्फ होती है। जिसे विज्ञानी पर्माफ्रास्ट कहते हैं। अध्ययन में पाया गया कि पर्माफ्रास्ट हर साल करीब 20 सेंटीमीटर तक पिघल रहा है।

    करोड़ों व्यक्तियों की जल आपूर्ति पर असर

    हिमालय से निकलने वाली नदियां एशिया की जीवनरेखा हैं। शोध के अनुसार सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों के वार्षिक जल प्रवाह का 33 से 42 प्रतिशत हिस्सा ग्लेशियर और बर्फ के पिघलने से आता है।

    इन नदियों पर करीब 86.9 करोड़ लोगों की आजीविका निर्भर है। विज्ञानियों का अनुमान है कि कई नदी बेसिन 2050 के आसपास पीक मेल्टवाटर की स्थिति तक पहुंच सकते हैं। इसके बाद जैसे-जैसे ग्लेशियर सिकुड़ेंगे, नदियों में पानी की मात्रा घटने लगेगी।

    वैज्ञानिकों की चेतावनी, बढ़ानी होगी निगरानी

    शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि हिमालय के बर्फ और ग्लेशियरों पर लगातार निगरानी, जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे का विकास और क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बेहद जरूरी है।

    हिमालय में हो रहे बदलाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका प्रभाव पूरे एशिया की जल, खाद्य और पर्यावरण सुरक्षा पर पड़ सकता है।