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    दो या अधिक जीवित संतान वाली सरकारी महिला कर्मचारियों को नहीं मिलेगी मैटरनिटी लीव: इलाहाबाद हाई कोर्ट 

    Updated: Tue, 11 Aug 2026 05:30 AM (IST)

    इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि दो या अधिक जीवित संतान वाली सरकारी महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश नहीं मिलेगा, भले ही वे पहली बार आवे ...और पढ़ें

    चौथी संतान के लिए नहीं मिलेगा मातृत्व अवकाश: हाई कोर्ट।

    चौथी संतान के लिए नहीं मिलेगा मातृत्व अवकाश: हाई कोर्ट।

    HighLights

    1. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मातृत्व अवकाश पर दिया महत्वपूर्ण फैसला।

    2. दो या अधिक जीवित संतान वाली महिला को अवकाश नहीं।

    3. याचिकाकर्ता शशि कुमारी की चौथी संतान के लिए अवकाश खारिज।

    विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी सेवक महिला की दो या अधिक जीवित संतानें हैं, तो उसे मातृत्व अवकाश की पात्रता नहीं होगी, भले ही वह किसी विशेष प्रसव के लिए पहली बार यह अवकाश मांग रही हो।

    यह आदेश न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान की एकल पीठ ने शशि कुमारी की याचिका पर दिया है। याचिकाकर्ता ने 19 जून 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके चौथे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश की मांग को खारिज कर दिया गया था। याचिका में यह भी प्रार्थना की गई थी कि विभाग को छह माह का मातृत्व अवकाश देने का निर्देश दिया जाए।

    याची अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने पहली तीन संतानों के जन्म पर कोई अवकाश नहीं लिया था। वह चौथी संतान के लिए पहली बार यह लाभ ले रही है, इसलिए उन्हें इससे इन्कार करने वाला आदेश मनमाना और कानून की दृष्टि से गलत है। राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही मातृत्व अवकाश ले चुकी है।

    जानकारी दी कि वित्तीय हस्त पुस्तिका के खंड-2, भाग-2 से 4 (अध्याय-10) के प्रविधानों के अनुसार मातृत्व अवकाश प्रसव की तारीख से 180 दिनों तक स्वीकृत किया जाता है। यह अवकाश तभी दोबारा मिल सकता है, जब पिछले स्वीकृत अवकाश की समाप्ति के दो वर्ष बीत चुके हों।

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    सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि यदि किसी महिला सरकारी सेवक की दो या अधिक जीवित संतानें हैं, तो उसे यह अवकाश स्वीकृत नहीं किया जा सकता, चाहे यह अवकाश अन्यथा देय क्यों न हो? गर्भपात के मामलों के लिए अलग से छह सप्ताह के अवकाश का प्रविधान है, जिस पर पहले तीन बार की सीमा 1990 की एक अधिसूचना के जरिये पहले ही हटाई जा चुकी है।

    कोर्ट ने कहा कि याचिका के साथ मूल दस्तावेजों की फोटो स्टेट प्रतियां नहीं लगाई गई थीं, बल्कि केवल टाइप की गई प्रतियां संलग्न थीं, जिनमें टाइपिंग की त्रुटियां पाई गईं। इससे कोर्ट को निर्णय लेने में कठिनाई हुई।

    इस पर रिपोर्टिंग सेक्शन को निर्देश दिया गया कि भविष्य में याचिकाओं के साथ उचित फोटोस्टेट प्रतियां भी संलग्न की जाएं। इस आदेश की प्रति रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष भी भेजी जाए।

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