बालिग व्यक्ति को अपनी इच्छा से धर्म अपनाने का अधिकार, इलाहाबाद HC का बेटियों को 25 लाख मुआवजा देने का आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि बालिग व्यक्तियों को अपनी इच्छा से धर्म चुनने का अधिकार है, जो माता-पिता के अधिकार से ऊपर है। कोर्ट ने इस्लाम ...और पढ़ें

वयस्क को अपनी इच्छा से धर्म अपनाने का अधिकार, 25 लाख दें मुआवजा: हाई कोर्ट।
HighLights
बालिगों को अपनी इच्छा से धर्म चुनने का अधिकार।
इस्लाम अपनाने पर बंधक बेटियों को 25 लाख मुआवजा।
पिता और सरकार संयुक्त रूप से देंगे यह राशि।
विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि बालिग व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता के आगे माता-पिता का अधिकार नहीं चल सकता। सक्षम वयस्क को अपनी स्वतंत्र इच्छा, आस्था और विश्वास के अनुसार धर्म अपनाने, छोड़ने या बदलने का अधिकार है।
कोर्ट ने इस्लाम अपनाने पर पिता द्वारा घर में बंधक बनाई गईं दो बालिग बेटियों को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। पिता और प्रदेश सरकार संयुक्त रूप से यह राशि देंगे और आठ सप्ताह के भीतर दोनों बहनों के बीच समान रूप से बांटी जाएगी।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने कुंवर सुल्तान अली और दो अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। मामला 20 वर्षीय दीया भाटिया उर्फ जोया दीया भाटिया और 35 वर्षीय अंशु भाटिया उर्फ अमीना अंशु भाटिया से जुड़ा है।
दोनों बहनों ने अदालत में बताया कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था। अंशु ने 2020 और दीया ने 2021 में मतांतरण किया था। उनका आरोप था कि धर्म बदलने के कारण उनके पिता ने उन्हें घर में कैद कर दिया। राज्य की ओर से पिता द्वारा दर्ज एफआईआर का हवाला देकर याचिका का विरोध किया गया।
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रिपोर्ट में हिंदू धर्म से इस्लाम में जबरन और धोखे से मतांतरण कराने का आरोप था। अदालत ने पाया कि उसके सामने ऐसा कोई तथ्य नहीं आया, जिससे यह लगे कि उन्होंने किसी दबाव, भय, प्रलोभन या अनुचित प्रभाव में धर्म बदला। कोर्ट ने कहा कि बालिग होने के बाद व्यक्ति अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेने की पूरी कानूनी क्षमता रखता है।
‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ में धर्म चुनने का अधिकारसंविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लेख करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ में सक्षम वयस्क को अपनी स्वतंत्र इच्छा, विश्वास और दृढ़ विश्वास के अनुसार धर्म अपनाने, त्यागने या बदलने का अधिकार भी शामिल है। महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध पैतृक घर में कैद रखकर स्वतंत्र पसंद का प्रयोग करने से रोका गया, जो अवैध कारावास और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।