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    कागजों में इंटरनेशनल स्टैंडर्ड, सड़क पर दरारें; एक्सपर्ट ने कहा- टिकाऊ सड़कों में रोड़ा बनीं कमजोर मॉनिटरिंग और ऑडिट

    Updated: Tue, 11 Aug 2026 09:17 AM (IST)

    भारत में सड़कों के निर्माण पर करोड़ों खर्च होने के बावजूद कमजोर मॉनिटरिंग और ऑडिट के कारण गुणवत्ता में कमी आ रही है। विशेषज्ञ एस. वेलमुरुगन ने टिकाऊ स ...और पढ़ें

    लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर मरम्मत का काम

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    HighLights

    1. सड़क निर्माण में कमजोर मॉनिटरिंग और ऑडिट बड़ी बाधा।

    2. कई एक्सप्रेसवे पर दरारें, जलभराव जैसी खामियां उजागर।

    3. विशेषज्ञ ने जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर दिया जोर।

    प्रभात पांडे, नोएडा। भारत में सड़कों की कनेक्टिविटी लगातार बेहतर हो रही है। पिछले कुछ वर्षों में एक्सप्रेसवे, हाईवे और कई सड़कों का निर्माण करोड़ रुपये खर्च कर किया गया, लेकिन दस्तावेजों में बने डिजाइन और तय किए गए मानकों की अनदेखी के कारण सड़कों पर विभिन्न तरह की खामियां सामने आ रही हैं। टिकाऊ सड़क के लिए मॉनिटरिंग और ऑडिट में लापरवाही रोड़ा बनी हुई है।

    ऐसे में जरूरी है कि सड़क निर्माण में हर स्तर पर जवाबदेही कड़ाई से सुनिश्चित की जाए। यह बातें दैनिक जागरण के सोमवार को नोएडा सेक्टर 63 स्थित कार्यालय में आयोजित जागरण विमर्श कार्यक्रम के दौरान एनसीईआर के वरिष्ठ सलाहकार और पूर्व मुख्य वैज्ञानिक, सीआरआरआई एस. वेलमुरुगन ने कहीं।

    मॉनिटरिंग की कमी हो रही उजागर

    भारत में एक शहर को दूसरे शहर से जोड़ने के लिए सरकार की और से विभिन्न एक्सप्रेसवे, हाईवे और सड़कों का निर्माण कराया जा रहा है। पीपीपी, हैम मॉडल समेत विभिन्न माडल्स पर इनका निर्माण हो रहा है। करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। निरीक्षण के लिए कई संस्थान के इंजीनियर होते हैं, कंप्लीशन सर्टिफिकेट तक जारी हो जाते हैं, लेकिन कुछ निर्माण कंपनियों के लापरवाही, अनदेखी,सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता की जांच न करना और मॉनिटरिंग नहीं होने के कारण कई खामियां सामने आ रही हैं।

    कहीं सड़क धंस रही तो कहीं हो रहा जलभराव

    हाल ही में ताजा मामला कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे, दिल्ली देहरादून एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेस वे समेत एनसीआर में विभिन्न परियोजनाओं में तैयार सड़कों के एक वर्ष में ही उखड़ने,दरारें आने, सड़क धंसने और जलभराव होने से कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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    मानकों को जमीन पर उतारने की बात

    एनसीईआर के वरिष्ठ सलाहकार और पूर्व मुख्य वैज्ञानिक, सीआरआरआई (केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान) एस वेलमुरुगन ने कहा कि देश में 1998 से स्वर्णिम चतुर्भुज योजना से शुरू हुआ सड़कों का जाल बिछाने और उनका कायाकल्प करने का दौर अब शानदार हाईवे और एक्सप्रेसवे के दौर में पहुंच चुका है, लेकिन लापरवाही के कारण कई खामियां भी सामने आई हैं। उन्होंने जवाबदेही तय करने को प्राथमिकता में रखने के साथ सड़क निर्माण के अंतरराष्ट्रीय मानकों को कागजों से ज्यादा जमीन पर उतारने की बात कही।

    एनएचएआई को कार्रवाई करने की बढ़े शक्ति

    एनएचएआई (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) और सड़क मंत्रालय के अधीन ही हाईवे, एक्सप्रेसवे का निर्माण किया जाता है। 5000 करोड़ से अधिक टर्नओवर वाली कंपनियां टेंडर लेकर कार्य करती हैं। बड़े हाईवे और एक्सप्रेसवे का निर्माण पैकेजों में किया जाता है। लेकिन घटिया निर्माण करने वाली कंपनियों पर कार्रवाई करने के पूरे अधिकार एनएचएआई के पास नहीं है। इनपर कार्रवाई करने के लिए एनएचएआई की शक्तियों को बढ़ाना चाहिए और संबंधित निर्माण कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना चाहिए। इसपर एस वेलमुरुगन का कहना था कि खामियां मिलने पर एनएचएआई समय-समय पर कार्रवाई करती है।

    इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का नहीं हो रहा पालन

    एस वेलमुरुगन ने कहा कि विभिन्न माडल्स पर सड़कें तैयार की जाती हैं। सड़क निर्माण करने वाली कंपनियों के पास इंटरनेशनल स्टैंडर्ड, आधुनिक उपकरण, मैनपावर सब उपलब्ध है। लेकिन सड़क निर्माण के दौरान इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का पालन नहीं होता है, कंपनी की ओर से लापरवाही औरमॉनिटरिंग की कमी खामियों का बड़ा कारण है। उन्होंने बताया कि सड़क निर्माण का सबसे अच्छा हैम मॉडल है जिसमें सरकार का 40 प्रतिशत और प्राइवेट निवेशक का 60 प्रतिशत हिस्सा होता है। इसके लिए प्रोजेक्ट डायरेक्टर नियुक्त होता है। निर्माण की पूरी जिम्मेदारी उसकी होती है।

    जवाबदेही के दायरे में लाया जाए

    लगातार सड़क निर्माण में खामियां सामने आने से प्रतीत हो रहा है कि सरकारी एजेंसियां गुणवत्तापूर्ण निर्माण से अधिक काम पूरा कराने पर ही ध्यान दे रही हैं। खामियां मिलने पर जिन कंपनियों पर कार्रवाई होती है तो वही कंपनियां नाम बदलकर फिर से टेंडर प्रक्रिया में शामिल हो जाती हैं। ऐसे जरूरी है कि खामियां मिलने पर निर्माण करने वाली कंपनियों को कड़ी कार्रवाई के दायरे में लाना होगा। एस. वेलमुरुगन ने कहा कि इसके लिए जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

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