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मथुरा में छाया जन्माष्टमी का उल्लास, द्वापर की फिर लौटी काली रात, जन्मभूमि में प्रकटे पालनहार

By Vineet Kumar Mishra Edited By: Prateek Gupta
Published: Fri, 04 Sep 2026 11:55 PM (IST)

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर 5253वां जन्मोत्सव बड़े उल्लास के साथ मनाया गया, जहां लाखों श्रद्धालुओं ने कान्हा के जन्म ...और पढ़ें

जन्माष्टमी पर जगमगाती श्रीकृष्ण जन्मभूमि।

जन्माष्टमी पर जगमगाती श्रीकृष्ण जन्मभूमि।

विनीत मिश्र, मथुरा। कान्हा, द्वारकाधीश, छलिया, नंदनंदन...नटवर नागर के कितने ही नाम हैं। हर नाम का अपना स्वरूप है। पूरी दुनिया उनको अलग-अलग स्वरूप में पूजती है। लेकिन ब्रजवासियों के लिए तो वह लाला हैं। द्वापर में कंस की कारा में देवकी और वसुदेव ही लाला के जन्म के साक्षी थे।

लेकिन कलियुग में लाखों श्रद्धालु अपने कन्हाई के जन्म का गवाह बनने को व्याकुल हैं। आधी रात लाला का उसी कारागार में जन्म हुआ, जहां द्वापर में हुआ था। तारणहार के आगमन को लेकर सुबह से जन्मस्थान का कण-कण उल्लास में डूब गया। हर कोना जयकारों से गूंजता रहा।

शुक्रवार की सुबह अन्य दिनों से अलग थी। श्रीकृष्ण जन्मस्थान के आसपास श्रद्धालुओं की भारी भीड़। फूलों से सजे कान्हा के आंगन को देखने के लिए कहां-कहां से सनातनी नहीं पहुंचे। आएं भी क्यों न, इस बार भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव जो है। कोई अपने लड्डू गोपाल के साथ पहुंचा तो कोई मोर पंख हाथों मेें सजाए था

आंखों में इंतजार बस रात के 12 बजने का था। सुबह साढ़े पांच बजे से ही लाला के आंगन में जन्मोत्सव के आयोजन होने लगे। पहले मंगला आरती हुई, फिर आराध्य का पंचामृत अभिषेक और पुष्पार्चन हुआ। दोपहर होते-होते जन्मस्थान के अंदर और बाहर पैर रखने की जगह भी नहीं बची।

Mathura Janmashtami Crowd

कान्हा के जन्मोत्सव का उल्लास क्या है, यह जयपुर से आईं सीमा राठौर से बेहतर भला और कौन बता सकता है। पति सुरेंद्र के साथ यहां आई हैं। साथ में अपने लड्डू गोपाल भी लाईं। कुछ देर जन्मस्थान के द्वार को निहारतीं रहीं, फिर ब्रज रज को माथे से लगाया। बोलीं, इससे अच्छा और क्या होगा।

लखनऊ के आलमबाग निवासी विश्वनाथ तिवारी और उनके साथी दीनानाथ पाठक भी उल्लास में डूबे हैं। चौथी बार जन्माष्टमी पर मथुरा आए। बोले, हम कृष्ण के उपासक हैं, उनका हर रूप में जीवन का दर्शन सिखाता है। जन्म के साक्षी बनकर आल्हादित और उल्लासित हैं।

मैनपुरी के गाड़ीवान मुहल्ले की सीमा के साथ बेटी मांडवी भी पहुंची। दो दिन से यहीं डेरा है। यमुना, गोकुल, गोवर्धन घूमने के बाद जन्मस्थान पहुंचीं। दो दिन और ठहरेंगी। कान्हा का हर लीला स्थल देखने की मन में इच्छा है। शाम को चार बजे और काले घने बादल छा गए, ऐसा लगा मानों द्वापर लौट आया।

कुछ बूंदाबांदी हुई, तो लोग बोले, यह वही भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी है, जब द्वापर में कान्हा जन्मे थे। शाम ढली तो जन्मस्थान रंग-बिरंगी रोशनी से नहा गया। फिर शुरू हुआ सुगंधित दृव्यों का छिड़काव। कलहंस पुष्प बंगले में विराजमान ठाकुर जी की अलौकिक छवि को निहार कोई धन्य हो गया

रात 11 बजे तो श्रीगणेश और नवग्रह स्थापना के साथ पूजन होने लगा। 12 बजे शुभ घड़ी का संकेत हुआ और फिर गूंजने लगा जय कन्हैया लाल की, हाथी घोड़ा पाल की...। कान्हा के चलित विग्रह को भागवत भवन में रजत कमल पुष्प पर विराजमान किया गया। कामधेनु गाय के प्रतीक से दुग्धाभिषेक शुरू हुआ।

श्रद्धालु उल्लास में ऐसे डूबे, मानों कान्हा ने उनकी मन की हर मुराद पूरी कर ली। रात डेढ़ बजे तक श्रद्धालुओं को दर्शन हुए। इस बार गर्भगृह में हुए लाला के अभिषेक को जन्मस्थान के बाहर एलईडी के जरिए प्रदर्शित किया गया।

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