रेलवे ने मनाया लखनऊ स्टेशन का 100वां जन्मदिन, लगाई गई ब्रिटिशकालीन उपकरणों की प्रदर्शनी
लखनऊ रेलवे स्टेशन ने अपना 100वां जन्मदिन धूमधाम से मनाया, जिसमें ब्रिटिशकालीन उपकरणों की प्रदर्शनी और स्टेशन के ऐतिहासिक सफर को दर्शाती लघु फिल्म प्रदर्शित की गई।

HighLights
लखनऊ स्टेशन ने 100वां जन्मदिन धूमधाम से मनाया।
ब्रिटिशकालीन उपकरण और ऐतिहासिक फिल्म प्रदर्शित की गई।
गांधी-नेहरू व भगत सिंह से जुड़े पल याद किए गए।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। रेलवे ने रविवार को लखनऊ स्टेशन का 100वां जन्मदिवस मनाया। इस अवसर पर लखनऊ स्टेशन पर ब्रिटिशकालीन रेलवे के समय बजने वाला घंटा, टिकट मशीन जैसे उपकरणों की प्रदर्शनी लगायी गई।
रेलवे बोर्ड ने लखनऊ सहित देश भर के 103 स्टेशनों को चिन्हित किया है जिनकी स्थापना या प्रारंभ की तिथि के अनुरूप स्टेशन महोत्सव आयोजित किया जा रहा है।
उत्तर रेलवे के लखनऊ मंडल ने लखनऊ रेलवे स्टेशन के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में स्टेशन महोत्सव का आयोजन किया। स्टेशन की वर्ष 1926 से अब तक की ऐतिहासिक यात्रा, विशिष्ट स्थापत्य विरासत एवं भारतीय रेल में इसके महत्व को प्रदर्शित करने वाली लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया।
इसके उपरांत लखनऊ मंडल के समर्पित एवं उत्कृष्ट कार्य करने वाले रेल कर्मचारियों को सम्मानित किया गया। रेलवे स्काउट्स एवं गाइड्स ने नुक्कड़ नाटक के माध्यम से यात्रियों को विरासत संरक्षण, स्वच्छता एवं यात्री सुरक्षा के प्रति जागरूक किया गया।
डीआरएम सुनील कुमार वर्मा ने गांधी उद्यान में महात्मा गांधी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।
स्टेशन परिसर में रैली आयोजित हुई। गांधी पार्क में पर्यावरण संरक्षण एवं हरित भविष्य का संदेश देते हुए पौधरोपण भी किया गया। प्लेटफॉर्म संख्या एक पर ऐतिहासिक छायाचित्रों एवं विरासत उपकरणों की विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई। इस अवसर पर एडीआरएम नीलिमा सिंह, स्टेशन निदेशक गौरव दीक्षित, वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक /फ्रेट प्रशांत कुमार भी उपस्थित थे।
सत्तर लाख रुपये में बना था स्टेशन
ब्रिटिश वास्तुकार जे.एच. हार्निमन और भारतीय वास्तुकार इंजीनियर चौबे मुक्ता प्रसाद ने लखनऊ स्टेशन की भव्य बिल्डिंग की डिजाइन तैयार की। वहीं, 21 मार्च 1914 को बिशप जार्ज हरवर्ट ने इसकी नींव रखी थी। स्टेशन का पहला चरण जहां आज रेल डाक सेवा है, वह 1923 में और दूसरा व अंतिम चरण 1925 में पूरा हुआ था।
एक अगस्त 1925 को ईस्ट इंडिया रेलवे के जी.एल. काल्विन ने प्रथम श्रेणी पोर्टिको के पास एक संदूक को गाड़ा। संदूक में एक सिक्का और उस दिन का अखबार रखा गया था। लखनऊ स्टेशन करीब 70 लाख रुपये में बनकर तैयार हुआ था।करीब 70 लखनऊ स्टेशन राजपूत, अवधी,मुगल और ब्रिटिश वास्तु शैली का अनूठा उदाहरण है।
ऊपर से देखने इसके मेहराब शतरंज की बिसात के रूप में दिखते हैं। जो इस स्टेशन को देश के दूसरे स्टेशनों से बहुत अलग बनाती है। सन 1884 में अविभाजित बंगाल को लाहौर से जोड़ने के लिए शुरू हुई 5 अप व 6 डाउन पंजाब मेल जैसी ऐतिहासिक ट्रेन लखनऊ स्टेशन से अपने 141 साल पुराने रिश्ते की गवाही देती है।
पहली बार मिले थे गांधी-नेहरू
26 दिसंबर से 30 दिसंबर 1916 तक लखनऊ में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में हिस्सा लेने के लिए महात्मा गांधी आए थे। इस अधिवेशन में महात्मा गांधी ने श्रमिकों की भर्ती कर विदेशों में ले जाने की प्रथा को बंद करने का प्रस्ताव रखा था। पंडित जवाहर लाल नेहरू से महात्मा गांधी की पहली बार मुलाकात लखनऊ स्टेशन पर ही हुई थी।
लखनऊ उतरे थे भगत सिंह और दुर्गा भाभी
लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज से उनकी मौत का बदला लेने के लिए लाहौर में 17 दिसंबर 1928 को भगत सिंह और राजगुरू ने ब्रिटिश अधिकारी सांडर्स की हत्या कर दी थी। वहां से 20 दिसंबर 1928 को क्रांतिकारी दुर्गा भाभी वोहरा लाहौर से हावड़ा मेल में भगत सिंह और राजगुरू के साथ सवार हुईं।
अंग्रेजों को चकमा देने के लिए कानपुर पहुंचकर उन्होंने ट्रेन बदला और फिर लखनऊ स्टेशन पहुंचकर भगत सिंह चाय पीने के बहाने उतरे। राजगुरू बच्चे का दूध लेने के लिए अलग चले गए । लखनऊ के रेल डाक सेवा से ही दुर्गा भाभी ने अपनी सहयोगी सुशीला दीदी को कलकत्ता एक तार भेजा, जिसमें लिखा था 'कमिंग विद ब्रदर- दुर्गावती'।
कमरे में बंद हाेते थे भारतीय यात्री
ब्रिटिश दौर में भारतीय अपने रिश्तेदारों को छोड़ने या लेने के लिए लखनऊ स्टेशन नहीं आ सकते थे। ट्रेन आने पर ही भारतीय यात्रियों को टिकट दिया जाता था। टिकट खरीदने के बाद सभी भारतीय यात्रियों को लखनऊ स्टेशन के एक कमरे में बंद कर ताला लगा दिया जाता था।
वह कमरा आज स्टेशन का रिकॉर्ड ऑफिस है। जब अंग्रेज यात्री बोगी में बैठ जाते थे, तब भारतीयों को कमरे से निकालकर उन्हें उनकी बोगियों में बैठाया जाता था। ट्रेन चलने से पहले बाहर से ताला लगाया जाता था। स्टेशन की वास्तुकला ऐसी थी कि अंदर खड़ी ट्रेन की आवाज बाहर नहीं आती थी।
