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    संस्कृति और संस्कृत के 'पटवर्धन': जिनके पूर्वजों ने क्रांतिकारी राजगुरु को पढ़ाया, अब कानपुर में संजो रहे सनातन की विरासत

    By Shiva AwasthiEdited By: Anurag Shukla
    Updated: Sat, 09 May 2026 03:24 PM (GMT+05:30)

    पंडित बलवंत भाऊ शास्त्री पटवर्धन कानपुर में वेदों, संस्कृति और सनातन धर्म की विरासत को संजो रहे हैं। उनके पूर्वजों ने क्रांतिकारी राजगुरु को भी पढ़ाया ...और पढ़ें

    पंडित बलवंत भाऊ शास्त्री पटवर्धन। स्वयं

    पंडित बलवंत भाऊ शास्त्री पटवर्धन। स्वयं

    HighLights

    1. पंडित बलवंत भाऊ शास्त्री वेदों के गहन जानकार हैं।

    2. उनके पूर्वजों ने क्रांतिकारी राजगुरु को भी वेद पढ़ाए।

    3. कानपुर में सनातन धर्म की विरासत को संजो रहे हैं।

    शिवा अवस्थी, कानपुर। वेदों के ज्ञान, साधना व सेवा...संस्कृति और संस्कृत के पटवर्धन। पटवर्धन अर्थात् महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण समुदाय का एक प्रमुख उपनाम, जिसका शाब्दिक अर्थ संस्कृत के पत्र यानी दस्तावेज और वर्धन का तात्पर्य वृद्धि अथवा संरक्षण है। हम जिनका यहां जिक्र करने जा रहे हैं वो इन दोनों ही कार्यों में सतत संलग्न हैं।

    चारों वेदों के अध्ययन से लेकर उनकी श्रुतियों, अभिलेख के संरक्षण संग युवा पीढ़ी में संस्कार भर रहे हैं। सनातन धर्म के मूल अनंत कहे जाने वाले वेदों के मर्मज्ञ हैं। ये बहुआयामी व्यक्तित्व हैं नौबस्ता के संजय गांधी नगर में रामलीला मैदान के पास रह रहे पंडित बलवंत भाऊ शास्त्री पटवर्धन, जिनकी प्रतिभा को कई राज्यपालों ने भी सराहा है। पढ़िए, ये रिपोर्ट...

    जानें इनकी पीढ़ियों को

    पहले बलवंत भाऊ शास्त्री की पीढ़ियों को जान लीजिए। महाराष्ट्र के पनवेल से वर्ष 1832 में उनके प्रपितामह के पिता बलवंत लक्ष्मण पटवर्धन काशी आए। वहीं 1835 में प्रपितामह व्यंकटेश बलवंत पटवर्धन का जन्म काशी में हुआ। ऋगवेद के अनेक शिष्यों को उन्होंने सांगवेद विद्यालय में पढ़ाया। पितामहअनंत व्यंकटेश पटवर्धन ने उनके बाद वेद का अध्यापन किया। उनके अनेक शिष्यों में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजगुरु भी शामिल थे। इसलिए ब्रिटिशकाल में उन्हें कई बार पुलिस से भी जूझना पड़ा। इसका सांगवेद विद्यालय में भी उल्लेख मिलता है।

    उन्नाव से भी नाता

    भाऊ शास्त्री पटवर्धन उर्फ सुधाकर उनके पिता थे। उनको भी बलवंत शास्त्री के रूप में वेदों का अध्ययेता पुत्र वर्ष 29 मई,1956 में मिला, जिन्हें पटवर्धन गुरुजी के उपनाम से ख्याति प्राप्त है। काशी में जन्मे और वहीं की गलियों में पले बलवंत भाऊ वर्ष 1973 में उन्नाव के शुक्लागंज स्थित दुर्गा मंदिर में आ गए। आगे चलकर उन्हें चक्रदेव गुरुजी, पंडित बाबूराम अग्निहोत्री, आचार्य शीतलाप्रसाद का सानिध्य मिला।

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    फिर कानपुर आए

    कानपुर में प्रतिष्ठित आचार्य सोमदत्त वाजपेयी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने शास्त्रीय ग्रंथों का अध्ययन किया। वर्ष 1974 से प्रत्येक वर्ष चतुर्थी पर वे बिठूर स्थित प्राचीन श्रीगणेश मंदिर एवं निराला नगर के गजानन मंदिर में पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। वह नाव चलाने, कुश्ती व तैराकी में कुशल होने के साथ ही संगीत में विशेष रुचि रखते हैं। एक ही आसन पर उन्होंने सप्तशतीके 12 पाठ किए हैं। वे कहते हैं कि सनातन धर्म के युवा भले विदेशी भाषा पढ़ें पर भारतीय संस्कृति का ज्ञान अति आवश्यक है। तिथि व पर्व को मनाने-जानने के साथ ही अपनी संस्कृति व प्राचीन सनातन धर्म के बारे में अवश्य जानना ही चाहिए। वो कर्मकांड व ज्योतिष की शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले ब्राह्मण बालकों व जिज्ञासु विद्यार्थियों को निश्शुल्क मार्गदर्शन व शिक्षा भी देते हैं।

    वे कुछ ऐसे समझाते हैं वेदों का मर्म

    वेद का अर्थ ज्ञान की राशि है। वेद किसी ने लिखा नहीं, सुना गया, इसलिए श्रुति भी कहते हैं। सनातन धर्म के मूल वेद अनंत कहे गए हैं। चतुर्वेदों के जानकार पटवर्धन बताते हैं कि ऋग्वेद की आठ, यजुर्वेद की 86, सामवेद की 1000 व अथर्वेद की नौ शाखाएं हैं।

    कालांतर में जब भारतीय संस्कृति के ऊपर आक्रांताओं ने आक्रमण किया तो उन्होंने वेदों समेत यहां की आध्यात्मिक व धार्मिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने का काम किया। इससे कई शाखाएं लुप्त हो गईं तो तमाम नष्ट भी हो चुकी हैं। ऋग्वेद की दो शाखाएं आश्वलायन व संख्यायन, यजुर्वेद के दो भेद कृष्ण व शुक्ल यजुर्वेद हैं, जबकि शुक्ल यजुर्वेद की शाखा मध्यान्दिनी व कण्व, कृष्ण यजुर्वेद की शाखा तैतिरीय, हिरण्यकेशीय, सामवेद की दो शाखाएं कौथुमी एवं रानायनी और अथर्वेद की दो शाखाएं शौनकी एवं ब्रह्मलाबला हैं।

    ऋग्वेद से आयुर्वेद निकला है, जो उपवेद है। यजुर्वेद से धनुर्वेद, सामवेद से गांधर्ववेद व अथर्वेद से शिल्प का जुड़ाव है। चारों वेदों में से पहले अलग-अलग समहिता, ब्राह्मण, आरण्यक प्रधान शाखाओं को पढ़ना आवश्यक है। वेद में मंत्रों को सूक्त कहते हैं। किसी भी वेद में पुरुष सूक्त के अध्ययन से वेदों के पाठ का फल मिल जाने की मान्यता है, जिसे सहस्त्र शीर्षा पुरुष: कहते हैं।

    वेदों में सूक्त के उच्चारण अलग-अलग हैं। वेदों को अंगीकृत करने के लिए गुरु के पास जाएं। वेदों में तीन स्वर हैं उदात्त, अनुदात्त व स्वरित, इनसे ही सात स्वर सा रे गा मा पा धा नी निकले हैं। इन्हीं स्वरों के अनुरूप ही वेदों के मंत्र पढ़े जाते हैं।

    ये मिल चुके सम्मान

    • 1976 : उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गनपत राव देव जी तपाशे ने राजभवन में पुरस्कृत किया।
    • 1998 : ब्रह्मगुप्त प्राच्य ज्योतिष विश्लेषण वेदशाला काशी की ओर से ज्योतिष रत्न सम्मान।
    • 2001 : कर्नाटक की राज्यपाल रमादेई के हाथों मिला विद्या वारिधि सम्मान।
    • 2026 : कानपुर के वैदिक ब्राह्मणों की ओर से सारस्वत सम्मान।


    ये पुस्तकें प्रकाशित

    श्रीगणेश प्रकाशनमाला के तहत वह अनवरत लेखन के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उन्होंने ब्रह्मावर्त महात्म्य, गणेश गीता का हिंदी अनुवाद, नवग्रह ज्ञान संग्रह, पौराणिक रुद्रभिषेकार्चन पद्धति, संध्योपासन पद्धति, गुरु महिमा, वेदांग ज्योतिष अनुवाद, साधारण पूजन विधि समेत 26 पुस्तकों की भी रचना की है। अभी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।

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