208 साल पुराने पत्र ने खोला इतिहास, कानपुर में तैनात मेजर की पत्नी ने लिखा था- तुम्हारे लिए खुशखबरी है!
कानपुर में 208 साल पुराने एक पत्र ने शहर के डाक इतिहास के कई अनछुए पहलुओं को उजागर किया है, जिसे आदित्य अस्थाना ने अमेरिका से नीलामी में खरीदा था।

वर्ष 1818 में मेजर एंबरी को उनकी पत्नी की ओर से लिखा गया पत्र का लिफाफा। संग्रहकर्ता
HighLights
आदित्य अस्थाना ने अमेरिका से 208 साल पुराना ऐतिहासिक पत्र खरीदा।
यह पत्र कानपुर में ब्रिटिश डाक अधिकारियों की उपस्थिति का प्रमाण।
कानपुर में 1799 से डाक सेवा का समृद्ध इतिहास रहा है।
मोहम्मद दाऊद खान, कानपुर। इंटरनेट युग में पत्रों को भेजने का चलन कम हो गया हो, लेकिन एक जमाना था जब डाक पहुंचाने के लिए ठेकेदारों की नियुक्ति की जाती थी। मिलों में डाकघर खुले हुए थे। ये ठेकेदार डाकघर श्रमिकों की डाक को पहुंचाने का कार्य करते थे। डाक पहुंचाने के लिए घोड़ों का प्रयोग किया जाता था। लाला ठंठीमल भी ऐसे ही ठेकेदारों में से एक थे।
माना जाता है कि जिले में अंग्रेजों ने 1802 में डाकघर स्थापित किया था, लेकिन डाक विभाग के जानकारों के अनुसार वर्ष 1799 में यहां पोस्टमास्टर की नियुक्ति हो चुकी थी। पत्रों के संग्रहकर्ता व डाक से संबंधित इतिहास के जानकार आदित्य अस्थाना बताते हैं कि अंग्रेज लेखक हैमंड गिलिस की पुस्तक हैंडस्ट्रक पोस्टमार्क ऑफ इंडिया में लिखा है कि वर्ष 1802 में प्रशासनिक व नागरिक डाक सेवा मजबूत हुई।
1837 में एकीकृत डाक प्रणाली की स्थापना की गई। इसमें गवर्नर जनरल को ईस्ट इंडिया कंपनी के क्षेत्रों में डाक भेजने के अधिकार प्रदान किए गए। वर्ष 1885 से 1895 तक नगर में डाक सेवा का विस्तार हुआ। अनवरगंज, एल्गिन मिल्स, म्योर मिल, जनरलगंज व चौक में डाकघर खोले गए।
संरक्षित है 208 साल पुराना पत्र
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यह पत्र 20 जनवरी 1818 को मेजर थामस एंबरी को उनकी पत्नी ने लिखा था। मेजर थामस एंबरी उस समय कानपुर बिठूर में तैनात थे। उनकी पत्नी सरसैया घाट के पास बने आवास में रहती थी। मेजर एंबरी बंगाल सैपर्स एड माइनर्स कोर के पहले कमांडेंट थे।

208 साल पुराना यह पत्र यह पत्र शारदा नगर निवासी आदित्य अस्थाना के संग्रह में है। उन्होंने इसको अमेरिका से नीलामी में खरीदा था। इनके पास वर्ष 1818 से लेकर आजादी के बाद तक के करीब एक हजार पत्रों का संग्रह है।
अदित्य अस्थाना के कानपुर का इतिहास शीर्षक वाले संग्रह को पिछले वर्ष कोरिया में आयोजित प्रदर्शनी में लार्ज वर्मील पदक भी मिल चुका है। यह पदक चांदी का होता है, जिस पर सोने का पत्तर चढ़ा होता है। इस प्रदर्शनी में 65 देशों के संग्रहकर्ताओं ने भाग लिया था।
कानपुर में ब्रिटिश डाक अधिकारी की उपस्थिति के प्रमाण
आदित्य अस्थाना बताते हैं कि वर्ष 1799 में कानपुर में ब्रिटिश डाक अधिकारी की उपस्थिति के प्रमाण मिलते हैं। इसके अभिलेख भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध है। उस समय कानपुर में तैनात डिप्टी पोस्टमास्टर लेफ्टिनेंट ए ओर्मे ने डाक धावकों की कमी को लेकर पोस्ट मास्टर जनरल से पत्राचार किया था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वर्ष 1857 में कानपुर का डाकघर जला दिया गया था। यह डाकघर ठंडी सड़क पर हुआ करता था।
प्रयागराज से घोड़ा गाड़ी पर आई थी डाक
लाला ठंठीमल ने जिले में महजनी डाक सेवा की शुरुआत की थी। उन्होंने इसके लिए इंडियन ट्रांजिट कंपनी खोली थी। यह सेवा घोड़ों के माध्यम से चलती थी। प्रयागराज से कानपुर डाक लाने में घोड़ों का प्रयोग किया जाता था। यह व्यवस्था 1850 में शुरू की गई थी।
लाला ठंठीमल के वंशज विनोद टंडन बताते हैं कि उस समय प्रयागराज से कानपुर के बीच लगभग 120 किलोमीटर की दूरी थी। बीच में 17 पड़ाव थे। डाक पहुंचाने वालों के लिए हर सात किलोमीटर पर घोड़ा बदलने के लिए स्थान निर्धारित हुआ करता था। डाक पहुंचाने वाले कमर में घंटी बांधे रहते थे तथा साथ में भाला रखते थे।
कानपुर तक वर्ष 1933 में हवाई डाक सेवा का विस्तार
जुलाई 1933 को इंपीरियल एयरवेज की लंदन-कराची-दिल्ली हवाई डाकसेवा का कानपुर व इलाहाबाद होते हुए कोलकाता तक विस्तार किया गया। वापसी की उड़ान कोलकाता से रवाना होकर 11 जुलाई को कानपुर व 17 जुलाई को लंदन पहुंची थी।
