डाकिया डाक लाया से 'ग्लोबल' सफर: 172 साल में बदल गया डाकघर का रूप, अब गांव से विदेश पहुंच रहा सामान
डाक विभाग ने समय के साथ खुद को ढालते हुए पारंपरिक चिट्ठियों से आगे बढ़कर बैंकिंग, बीमा, पार्सल, पासपोर्ट और निर्यात जैसी आधुनिक सेवाएं प्रदान करना शुरू कर दिया है।

विश्व डाक दिवस। (जागरण)
HighLights
डाक विभाग ने खुद को समय के साथ आधुनिक बनाया।
बैंकिंग, बीमा, पार्सल, पासपोर्ट जैसी कई सेवाएं प्रदान करता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में निर्यात और नागरिक सेवाओं का केंद्र बना।
राजीव, दुमका। कभी साइकिल पर संवार गांव की गलियों से गुजरते हुए डाकिया हाथ में क्रीम रंग का पोस्टकार्ड और नीले रंग का अंतर्देशीय लिए घर की चौखट पर दस्तक देता था तो उसके हाथ में अपनों की खबर व संदेश होती थी।
चिट्ठी के साथ भावनाएं और मनीआर्डर की उम्मीदें भी पहुंचती थी। समय के साथ संचार के साधन बदले, चिट्ठियों का दौर सिमटा, लेकिन डाक विभाग ने खुद को समय के साथ ढाल लिया।
आज यही डाकघर बैंकिंग, बीमा, पार्सल, आयात-निर्यात व पासपोर्ट बनाने के साथ कई नागरिक सेवाओं का केंद्र बन चुका है। दुमका के वरिष्ठ डाक अधीक्षक कार्यालय के अधिकारी वीके श्रीवास्तव बताते हैं कि भारत में डाक सेवा का इतिहास पुराना व दिलचस्प है।
देश में शेरशाह सूरी के समय संदेश पहुंचाने की व्यवस्थित व्यवस्था विकसित हुई थी। आधुनिक डाक व्यवस्था का विस्तार ब्रिटिश काल में हुआ।
1774 में कोलकाता जीपीओ की स्थापना हुई। इसके बाद चेन्नई और मुंबई में डाक व्यवस्थाएं मजबूत हुई। एक अक्टूबर 1854 को आधुनिक भारतीय डाक विभाग का औपचारिक गठन हुआ था।
उस समय देश में करीब 700 डाकघर थे। इसके बाद सेवाओं का लगातार विस्तार होता चला गया। 1879 में पोस्टकार्ड, मनीआर्डर और फिर 1882 में पोस्ट आफिस सेविंग्स बैंक ने डाकघर को आम आदमी की रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ा दिया।
1884 में पोस्टल लाइफ इंश्योरेंस की शुरुआत हुई थी। इस पहल के बाद डाकघर संदेश के साथ बचत और सुरक्षा का माध्यम भी बन गया।
आजादी के बाद गांव-गांव में हुआ डाक नेटवर्क का विस्तार
देश की आजादी के बाद गांव-गांव तक डाक नेटवर्क का विस्तार हुआ। 1986 में स्पीड पोस्ट ने तेज और समयबद्ध डाक सेवा के नए दौर की शुरूआत की।
वर्ष 2025 आते-आते कंप्यूटरीकरण, आनलाइन ट्रैकिंग और पार्सल सेवाओं ने डाक व्यवस्था को तकनीक से जोड़ दिया गया। यही कारण है कि इंटरनेट और मोबाइल के बढ़ते प्रभाव के बावजूद डाक विभाग ने अपनी उपयोगिता बनाए रखने में सफल है।
डाकघर अब बैंकिंग का ही नहीं आयात-निर्यात का भी केंद्र
बदलते दौर में डाक विभाग ने सबसे बड़ा बदलाव वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में किया है। इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक के जरिए बैंकिंग सेवाएं घर-घर पहुंचाने की कोशिश तेज की गई।
डाकघर बचत योजनाओं, बीमा, पार्सल, आधार और अन्य नागरिक सेवाओं के लिए भी डाक केंद्र महत्वपूर्ण केंद्र बना चुका है। खासकर ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में इसकी पहुंच आज भी इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
संताल परगना प्रमंडल में डाक विभाग के माध्यम से दुमका, गोड्डा, साहिबगंज और पाकुड़ में संचालित डाक-निर्यात केंद्र ने इस इलाके की पहुंच गांव से ग्लोबल कर दिया है।
इसकी वजह से दुमका से बांस से निर्मित सामग्रियों से लेकर गोड्डा के भगैया का तसर सिल्क, काऊ-पी, पाकुड़ का पत्थर चिप्स विदेशों में निर्यात होना संभव हो सका है।
दुमका में निर्मित बांस की सामग्रियों का खेप स्केंडिनेविया तक भेजी जा रही है। दुमका में स्थापित पाेस्ट आफिस पासपोर्ट सेवा केंद्र के माध्यम से प्रतिदिन औसत पांच पासपोर्ट और साल भर में करीब 1000 से अधिक पासपोर्ट बन रहा है।
गंगा से लेकर तिरंगा तक जोड़ी भावना
एक वक्त था जब बहनें अपने भाइयों के लिए एक माह पहले से ही राखियां भेजने व उसके पहुंचने की खबर के लिए आतुर रहती थीं। डाक विभाग ने बहनों की इस भावना को अब सुलभ व भरोसेमंद बना दिया है।
अब बहनें डाक विभाग में जाकर वहां उपलब्ध राखियां व संदेश पर नाम-पता डालकर निश्चिंत हो जाती हैं। घर-घर में सुलभ तरीके से गंगा जल और तिरंगा पहुंचाने की जिम्मेवारी भी डाक विभाग बखूबी निभा रहा है।
डाक विभाग की अहम जन सेवाएं
- पोस्टल लाइफ इंश्योरेंस और ग्रामीण पोस्टल लाइफ इंश्योरेंस
- सुकन्या समृद्धि योजना
- महिला सेविंग सर्टिफिकेट स्कीम
- डाक निर्यात केंद्र
- पासपोर्ट सेवा केंद्र
- टर्म डिपोजिट स्कीम
- आरडी स्कीम
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डेढ़ सदी से ज्यादा समय का डाक विभाग के सफर व बदलाव की कहानी रोचक और दिलचस्प है। कभी चिट्ठी पहुंचाने वाला डाकिया आज डिजिटल भुगतान, बैंकिंग और पार्सल सेवाओं की कड़ी है। माध्यम बदला तो अब देश-दुनिया को जोड़ने की भूमिका में आ गए हैं।
