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अब लिवर टेस्ट से ही मिल जाएंगे गालब्लैडर कैंसर के शुरुआती संकेत, शोध में सामने आया तथ्य

Published: Sat, 30 May 2026 12:39 PM (IST)

गोरखपुर विश्वविद्यालय, एचपीपी कैंसर अस्पताल और मगोवि के संयुक्त शोध में सामने आया है कि सामान्य रक्त और लिवर जांच ...और पढ़ें

गोरखपुर विश्वविद्यालय। जागरण

 गोरखपुर विश्वविद्यालय। जागरण

HighLights

  1. सामान्य रक्त व लिवर जांच से कैंसर की शुरुआती पहचान।

  2. गालब्लैडर कैंसर लिवर, किडनी, मेटाबॉलिज्म को भी प्रभावित करता है।

  3. पूर्वी उत्तर प्रदेश के 286 लोगों पर हुआ यह शोध।

जागरण संवाददाता, गोरखपुर। गालब्लैडर कैंसर की शुरुआती पहचान और बेहतर इलाज की दिशा में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र तथा महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के संयुक्त शोध अध्ययन में महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। अध्ययन में पाया गया है कि सामान्य रक्त व लिवर जांच के जरिए भी गालब्लैडर कैंसर के शुरुआती संकेत मिल सकते हैं।

अध्ययन में कैंसर मरीजों और स्वस्थ व्यक्तियों के लिवर, किडनी व रक्त संबंधी मानकों की तुलना की गई। इसमें कैंसर मरीजों में ब्लड शुगर, बिलीरुबिन, यूरिया, क्रिएटिनिन और लिवर एंजाइम का स्तर अधिक, जबकि हीमोग्लोबिन कम पाया गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार यह अध्ययन भविष्य में कम खर्च वाली जांच के माध्यम से समय रहते कैंसर की पहचान, मानिटरिंग और बेहतर उपचार रणनीति विकसित करने में मददगार हो सकता है। अपने मई के अंक में शोध पत्र स्प्रिंगर नेचर समूह के अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘डिस्कवर आंंकोलाजी’ ने इसे प्रकाशित कर शोध की मौलिकता पर मुहर लगाई है।

शोधार्थी प्रिया साहनी ने बताया है कि शोध में यह भी सामने आया कि गालब्लैडर कैंसर केवल पित्ताशय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह लिवर, किडनी और शरीर की मेटाबालिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है। इसके लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के 143 कैंसर मरीजों और 143 स्वस्थ लोगों समेत कुल 286 लोगों के रक्त नमूनों का अध्ययन किया गया। मरीजों में एलएफटी, केएफटी और सीबीसी के कई मानक सामान्य से अधिक पाए गए।

शोध निर्देशक प्रो. शरद मिश्र ने बताया कि कई मरीजों में हीमोग्लोबिन और लिम्फोसाइट्स की मात्रा कम, जबकि डब्ल्यूबीसी और न्यूट्रोफिल्स की संख्या अधिक पाई गई। यह शरीर में लगातार सूजन, प्रतिरोधक क्षमता में कमी और कैंसर के बढ़ते प्रभाव का संकेत है।

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बढ़ती उम्र के साथ कैंसर के खतरे भी अधिक
शोध में अलग-अलग आयु वर्ग के पुरुष व महिलाओं को शामिल किया गया। ज्यादातर मरीज 41 से 70 वर्ष की आयु के थे। इनमें 68.53 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं। इनमें ग्रामीण क्षेत्रों के 81.82 प्रतिशत मरीज रहे। शोध में मरीजों के व्यवसाय, स्मोकिंग व शराब पीने की लत, जलापूर्ति जैसे विषयों को भी रखा गया।

संयुक्त शोध में इनका रहा योगदान
इस शोध में गोवि के प्रो. शरद मिश्र व शोधार्थी प्रिया साहनी के अलावा हनुमान प्रसाद पोद्दार कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र की डा. पूनम गुप्ता, डा. सीपी अवस्थी और डा. नरेंद्र बिरबिया तथा महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय की डा. अनुपमा ओझा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शोधार्थी प्रिया ने बताया कि भविष्य में इस अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए गालब्लैडर कैंसर में जीन स्तर पर होने वाले उत्परिवर्तनों का भी अध्ययन किया

यह अध्ययन केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रयास भी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में गालब्लैडर कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच यह शोध आम लोगों के लिए उम्मीद की नई दिशा देता है। सामान्य रक्त जांच एवं बायोकेमिकल परीक्षणों के माध्यम से बीमारी की गंभीरता का प्रारंभिक संकेत मिलने की संभावना भविष्य में ग्रामीण और सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी कैंसर की समय रहते पहचान में मददगार हो सकती है।

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-प्रो. पूनम टंडन, कुलपति, दीदउ गोरखपुर विश्वविद्यालय