मोरारी बापू की चेतावनी: इन 6 मौकों पर भूलकर भी न करें गुस्सा, वरना हाथ से निकल जाएगी सुख-शांति
मोरारी बापू ने स्वाधीनता को आत्म-अनुशासन और मन की स्वतंत्रता से जोड़ा है, जिसमें नकारात्मक विचारों से मुक्ति आवश्यक है। उन्होंने सुख-शांति के लिए छह म ...और पढ़ें

मोरारी बापू के अनमोल वचन

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
मोरारी बापू (कथावाचक)। स्वाधीनता में सबसे महत्वपूर्ण स्वयं का अनुशासन है। स्वतंत्रता का अर्थ है अपने खुद के तंत्र में रहना, न कि किसी बाहरी या विकृत व्यवस्था के अधीन होना। अपने तंत्र में रहना तभी सार्थक है, जब हमें अपने कर्तव्यों का बोध भी हो।
नागरिक कर्तव्यों का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है, जितना नागरिक अधिकारों को जानना और मांगना। जिसने कभी परतंत्रता का कष्ट झेला हो, वही स्वाधीनता की असली कीमत और उसकी पवित्रता को गहराई से महसूस कर सकता है। गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस के बाल कांड में लिखा है- पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं। यानी पराधीन व्यक्ति कभी भी सुख का अनुभव नहीं कर सकता है।
पराधीनता एक तरह का अभिशाप होता है। मानव ही नहीं, पशु-पक्षी भी पराधीनता में सुखी नहीं रह पाते। आध्यात्मिक रूप से देखें तो जब पराधीन पशु-पक्षी भी खुश नहीं रह सकते तो पराधीन मन कैसे खुश रह सकता है? व्यक्ति की प्रसन्नता के लिए सबसे जरूरी है मन की स्वाधीनता। मेरी दृष्टि में स्वाधीन मन वह है जो संशय से मुक्त है, अंधेरों से मुक्त है। जो नकारात्मक विचारों से मुक्त है।
हम स्वाधीन हैं, स्वतंत्र हैं मगर हमारा मन तमाम तरह की शंकाओं से भरा है, नकारात्मक विचारों से भरा है तो हम उन शंकाओं और विचारों के पराधीन हो गए। भगवद्गीता के संदर्भ में सोचें तो मन का संशय नाश कर देता है। स्वतंत्र होने के बाद भी आजकल लोग इतने निराश और दु:खी क्यों हो? ये तो जीवन में प्रसन्न रहने के पल हैं। दुख और निराशा का बड़ा कारण हमारे मन के संशय हैं। याद रखिए कि जो व्यक्ति सब काम करके रात्रि में मन में संतोषभाव के साथ सो रहा है और सुबह जागते समय जिसका मन उमंग-उल्लास से भरा है, वह आध्यात्मिक रूप से स्वाधीन है।
मन को नकारात्मक विचारों, भावो से निकालते हुए सकारात्मकता में परिवर्तित करने की विद्या जो सीख गया, उसका मन पराधीन नहीं रहता। इसके लिए रोजाना अपने मन के निरीक्षण की आदत बनाइए। जिस मन में सत्य है, प्रेम है, करुणा है, उसमें स्वतः स्वाधीनता के गुण आ जाते हैं। जिस मन में ईर्ष्या, द्वेष और निंदा के भाव भरे हैं, वे स्व के अधीन नहीं है बल्कि दूसरे लोगों के अधीन है। ऐसा मन न स्वाधीन है और न ही सुख से भरा है।
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हम गाते हैं... हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। बात स्वाधीनता की हो या राष्ट्र के भविष्य की, इस देश के युवाओं से सभी को बहुत उम्मीदें हैं। मैं तो कथाओं में देख रहा हूं कि युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। अब तक ये सिलसिला चलता रहा है कि जो संसार में किसी काम करने लायक नहीं रहे, ऐसे लोग ही सत्संगों में, कथाओं में पहुंचते थे। अब देश और विदेश, दोनों ही जगहों पर कम से कम 30 प्रतिशत लोग युवा होते हैं। मुझे लगता है कि बदलाव आ रहा है। युवाओं के इस बदलाव को लेकर मैं बहुत आश्वस्त हूं।
बार-बार कहता रहता हूं कि भारत का भविष्य बहुत ही उज्जवल है। आप मांगेंगे तो मैं इसका प्रमाण नहीं दे पाऊंगा लेकिन ये साधु के अंत:करण की आवाज है। यह एक साधु का भारत के युवाओं पर भरोसा है। अगर मेरी कथाओं में 30 प्रतिशत से अधिक युवा श्रोता आ रहे हैं तो मैं भरोसे के साथ कह सकता हूं कि उन्होंने आध्यात्मिकता का अर्थ भी समझा है और स्वाधीनता का भी। वे स्वाधीनता का कोई दुरुपयोग नहीं कर रहे, बल्कि मन को शांत रखकर आध्यात्मिक उन्नति भी कर रहे हैं और राष्ट्र व समाज की उन्नति में भी सहायक बने हुए हैं। सभी से मेरा अनुरोध है कि स्वाधीनता का उपयोग सही दिशा में ही होना चाहिए। निर्भीकता अच्छी है, लेकिन निरंकुशता को सही नहीं ठहराया जा सकता। अगर अध्यात्म की राह पर चलना है तो युवाओं के लिए क्रोध से बचना जरूरी है। क्रोध में जागे, क्रोध में सोवे, बाद में जो भी होवे, वो भी खोवे।
युवाओं से मेरा कहना है कि छह जगहों पर बिल्कुल भी क्रोध न करें। पहला, सुबह उठते ही क्रोध न करें। दूसरा, भजन-पूजन के समय क्रोध न करें। तीसरा, घर से बाहर जाते समय क्रोध न करें। चौथा, दफ्तर से आते समय क्रोध न करें। पांचवां, बच्चों पर क्रोध न करें और छठे रात्रि में सोते समय क्रोध न करें। आप पूछेंगे कि इन छह के अलावा क्या कहीं भी क्रोध कर सकते हैं, तो उसके जवाब में मेरा कहना है कि जब आप इन छह स्थानों पर क्रोध नहीं करेंगे तो फिर धीरे-धीरे क्रोध आपसे छूट ही जाएगा।
स्वाधीनता को गहराई से समझना हो तो गीता का भी आश्रय लिया जा सकता है।
गीता में अपने स्वभाव में रहकर जीने की बात की गई है। दूसरे के स्वभाव में या प्रभाव में जीना पराधीनता है। स्वाधीनता की बात करते हुए ये भी ध्यान रखना है कि व्यवस्था ऐसी हो, जो किसी दूसरे को अव्यवस्थित न कर दे। यह बात व्यक्तिगत रूप से भी, पारिवारिक रूप से भी और समाज व राष्ट्र के स्तर पर भी लागू हो। व्यवस्था आत्म-नियंत्रण और आत्म-साक्षात्कार से भी जुड़ी हो और नागरिक रूप में हम भी यह ध्यान रखें कि हमारा कोई व्यवहार, हमारी कोई क्रिया राष्ट्र और समाज की अहित में ना हो। किसी बाहरी या अंदरूनी शक्ति के प्रभाव या दबाव में आकर कोई कार्य ऐसा ना करें, जिससे राष्ट्र या समाज का कोई भी नुकसान हो।
स्वाधीन राष्ट्र वह है, जिसके पास सृजन शक्ति हो। किसी भी क्षेत्र में जो सृजन कर सकते हैं, उनके लिए पालन-पोषण की कोई चिंता न रहने दी जाए। उन्हें सृजन के अवसर दिए जाएं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करें तो वह तब है, जब हर व्यक्ति को अपनी क्षमताओं और प्रतिभा को विकसित करने और अपने जीवन का निर्णय लेने की स्वतंत्रता हो। राजनीतिक स्वतंत्रता तब है, जब देशवासियों में एकता और अखंडता बनी रहे। आध्यात्मिक स्वतंत्रता तब है, जब व्यक्ति अपने अहंकार से मुक्त हो जाता है और भगवान के प्रति समर्पण करता है। स्वाधीनता में व्यवस्था सम दर्शन वाली होनी चाहिए, विषमता वाली नहीं। स्वाधीनता का उपयोग ऐसे हो कि किसी के भी साथ विषमता न की जाए और न ही होने दी जाए।
स्वतंत्रता अगर शौर्य का परिणाम है तो यह संयम और धैर्य व शौर्य का भी प्रतीक है। स्वाधीनता की सार्थकता तभी है, जब शौर्यता के साथ-साथ धैर्य और संयम भी हो। अच्छा समय हो तो भी संयम, बुरा समय हो तो भी संयम। अच्छे काल में बहक न जाएं और समय खराब हो तो कमजोर न पड़ जाएं। असली स्वतंत्रता वह है कि हम सत्य, अहिंसा और प्रेम की राह पर चलें, लेकिन जरूरत पड़ने पर प्रहार और प्रतिकार करने की क्षमता भी हमारे हाथ में हो।