भृंगी ऋषि ने क्यों लिया था भंवरे का रूप? जानिए शिव-पार्वती के अर्धनारीश्वर अवतार से जुड़ा रहस्य
भृंगी ऋषि की शिवभक्ति और पार्वती को अनदेखा करने की कहानी, जिसमें शिव-पार्वती ने अर्धनारीश्वर रूप धारण कर उन्हें एकात्मता का बोध कराया। यह लेख श्रावण म ...और पढ़ें

भंवरा क्यों बने थे भृंगी ऋषि?

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
श्री श्री रवि शंकर (आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता, आध्यात्मिक गुरु)। प्रत्येक रूप शिव का ही रूप है। यह समस्त संसार शिवमय है और इसके कण-कण में शिव व्याप्त हैं...
यह असीम ब्रह्मांड और अनंत कालचक्र अपने भीतर बहुत सी सुंदर कहानियों को समेटे हुए हैं। ऐसी ही एक कहानी परम शिवभक्त भृंगी ऋषि की है, जो सदैव शिवभक्ति में लीन रहा करते थे। वे वैराग्य धारण करते थे और केवल शिव के संन्यासी रूप को ही पूजनीय मानते थे, गृहस्थ रूप को नहीं। एक बार जब वे शिव-पूजा कर रहे थे, तब माता पार्वती भी उनके पास बैठी हुई थीं। लेकिन ऋषि केवल शिव की ही परिक्रमा करना चाहते थे; अतः उन्होंने एक भंवरे का रूप धारण कर केवल शिव की ही परिक्रमा की।
ऋषि के केवल एक ही रूप की पूजा करने के उनके सीमित दृष्टिकोण को भंग करने के लिए शिव व पार्वती ने संयुक्त होकर अर्धनारीश्वर का रूप धारण कर लिया, जिसमें आधा शरीर शिव का तथा आधा शरीर पार्वती का था। जब ऋषि ने अर्धनारीश्वर रूप को देखा तो उन्हें बोध हुआ कि शिव और पार्वती अलग-अलग रूपों में होते हुए भी वस्तुतः एक ही चेतना हैं। उन्हें अपनी भूल का अनुभव हुआ। तब उन्हें यह भी बोध हुआ कि प्रत्येक रूप शिव का ही रूप है। यह समस्त संसार शिवमय है और इसके कण-कण में शिव व्याप्त हैं।
श्रावण मास हिंदू पंचांग का पांचवां और अत्यंत पवित्र महीना है। वैसे तो पंचांग के सभी मास शुभ होते हैं, किंतु श्रावण मास को भगवान शिव की आराधना और प्रार्थना के लिए विशेष रूप से मंगलकारी माना जाता है। शिव कोई व्यक्ति या कोई रूप नहीं हैं। शिव वह परम तत्व हैं, जिससे समस्त सृष्टि की उत्पत्ति होती है, जिसमें यह समस्त सृष्टि स्थिर रहती है और अंततः विलीन हो जाती है। शिव ही आकाश हैं। शिव ही चेतना हैं। ऊर्जा का स्थायी और शाश्वत स्रोत, अस्तित्व की सनातन अवस्था, जो एकमात्र और अद्वितीय है, वही शिव हैं।
श्रावण मास को शिव का प्रिय मास कहा जाता है, क्योंकि इस मास में पार्वती स्वरूपा प्रकृति खिल उठती है। वर्षा से सब कुछ धुलकर पावन और शुद्ध हो जाता है तथा पृथ्वी सौंदर्य से पल्लवित हो उठती है। हमारे पुराणों में कहा गया है- 'अलंकारप्रिय विष्णु, अभिषेकप्रिय शिव।' भगवान विष्णु अलंकार और शृंगारप्रिय हैं, किंतु भगवान शिव अभिषेक से प्रसन्न होते हैं। श्रावण मास में वर्षा होती है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण सृष्टि ही आकाश से जल का अभिषेक कर रही हो।
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मान्यता है कि भगवान शिव कैलास पर्वत पर निवास करते हैं। कैलास पर उनके निवास करने का भी निहितार्थ है। वास्तव में कैलास का अर्थ है वह स्थान, जहां केवल उत्सव हो, जहां केवल आनंद हो। जिस जगह उत्सव और आनंद होगा, वही कैलास है। जब आपके भीतर शिवतत्व का उदय होता है, तब आपका जीवन केवल एक उत्सव बन जाता है। प्रत्येक घटना उत्सव बन जाती है। जहां उत्सव होता है, वहीं शिवतत्व का वास है। वहीं शिवतत्व अभिव्यक्त होता है और जीवंत हो उठता है। शिव सदैव कल्याणकारी हैं और सभी के मंगल का आशीष देते हैं, इसलिए इस मास हम सभी के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।