मन और इंद्रियों को काबू में कैसे करें? यहां पढ़ें महाराज निमि की जिज्ञासा का आध्यात्मिक समाधान
महाराज निमि और नौ योगीश्वरों के मध्य संवाद श्रीमद्भागवत महापुराण की वह अमूल्य निधि है, जहां अध्यात्मिकता, नैतिकता, जीवन-प्रबंधन और दर्शन समाहित हैं, ज ...और पढ़ें
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इंद्रिय-सुख में उलझने से खोखला हो जाता है मन
आचार्य नारायण दास (आध्यात्मिक गुरु, श्रीभरत मिलाप आश्रम, ऋषिकेश)। महाराज निमि ने नौ योगीश्वरों के मध्य अपनी जिज्ञासा रखते हुए पूछा- हे योगीश्वरो! कृपया यह समझाइए कि जिनकी लौकिक कामनाएं नष्ट नहीं हुई हैं, लौकिक-पारलौकिक भोगों की लालसा मिटी नहीं है और मन एवं इंद्रियां भी वश में नहीं हैं तथा जो प्रायः भगवान का भजन नहीं करते, उन लोगों की क्या गति होती है?
भगवंतं हरिं प्रायो न भजन्त्यात्मवित्तमाः।
तेषामशांतकामानां का निष्ठाविजितात्मनाम्।।
महाराज निमि की जिज्ञासा का समाधान करते हुए, इस बार आठवें योगीश्वर चमस महाभाग ने कहा- हे राजन! जब मनुष्य अपने जीवन के परम ध्येय परमात्मा को विस्मृत कर इंद्रिय-सुख और संसार के नश्वर आकर्षणों में उलझ जाता है, तब उसका अंतःकरण अशांत हो उठता है। बाह्य वैभव चाहे जितना भी आकर्षक हो, ईश्वर-विमुखता उसे खोखला कर देती है। यह स्थिति उस वृक्ष के समान है, जिसकी जड़ें तो सूख चुकी हों, किंतु ऊपर कुछ हरियाली दिखाई देती है, लेकिन अंदर से वह जर्जर हो चुका होता है।
हे राजन! सृष्टि की प्रत्येक इकाई का संबंध परमात्मा से अभिन्न है। चारों आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास भगवान के ही विभिन्न अंगों के प्रतीक हैं। इसका गूढ़ तात्पर्य यह है कि समाज की प्रत्येक भूमिका और जीवन की प्रत्येक अवस्था ईश्वर-आधारित है। जब मनुष्य अपने वर्ण, पद या आश्रम के अहंकार में अपने मूल स्रोत भगवान का अनादर करता है, तब वह अनजाने में अपनी ही जड़ों पर कुठाराघात करता है। ऐसा व्यक्ति चाहे कित
ना ही प्रभावशाली क्यों न हो, उसका पतन अवश्यंभावी है।
केवल वेदाध्ययन, कुल-गौरव या कर्मकांड से मनुष्य सत्यस्वरूप भगवान का समीप्य नहीं प्राप्त कर सकता है, क्योंकि जब तक ज्ञान में भक्तिरस नहीं होगा, तब तक ये सब अहंकार का ही पोषण करते हैं। ऐसे लोग वेदों के मूल प्रयोजन परम तत्व की प्राप्ति को छोड़कर अर्थवाद के मीठे प्रलाप, स्वर्गादि के सुखों और भौतिक लाभों में उलझ कर रह जाते हैं। जिससे उनके भीतर नम्रता के स्थान पर कठोरता और आत्म-मुग्धता जन्म ले लेती है। तब ऐसे लोगों धर्मानुष्ठान आत्मशुद्धि का साधन न होकर, केवल प्रदर्शन का स्वरूप बन जाता है।
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हे राजन! जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को संयमित नहीं कर पाता और जिसकी कामनाएं निरंतर विस्तार पाती रहती हैं, उसकी स्थिति त्रिशंकु के समान कही गई है। न पूर्ण ज्ञानी, न पूर्ण अज्ञानी। वह अर्थ, धर्म और काम के अंतहीन चक्र में घूमता रहता है। क्षणिक सुखों से क्षणिक तृप्ति मिलती है, पर स्थायी शांति कभी नहीं। यही मनोवृत्ति आधुनिक जीवन-प्रबंधन की सबसे बड़ी विफलता को उजागर करती है। लक्ष्यहीन सक्रियता। ऐसे लोगों को शास्त्र ‘आत्मघाती’ की संज्ञा देते हैं, क्योंकि वे जानते हुए भी नाशवान वस्तुओं घर, संपत्ति और संबंधों को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं। मृत्यु का एक क्षण उनके समस्त स्वप्नों को चूर-चूर कर देता है, फिर भी नहीं चेतते हैं।
योगेश्वर चमस महाभाग कहते हैं, हे राजन! जो लोग किसी कारणवश भक्ति-मार्ग से दूर हैं, वे घृणा के नहीं, दया के पात्र हैं। एक सच्चे भक्त का कर्तव्य है कि वह भगवत्कथा, कीर्तन और प्रेम के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग को जोड़े। भगवद्भक्ति वह सेतु है, जो मनुष्य को संकीर्ण अहंकार से निकालकर व्यापक मानवता की ओर ले जाती है।
जीवन-प्रबंधन का मूल सूत्र यहां सुस्पष्ट है- ईश्वर से विमुख होकर अर्जित किया गया धन, ज्ञान, वैभव और यश अंततः अर्थहीन है। स्थायी शांति और संतुलन उसी को प्राप्त होता है, जो इंद्रियों को संयमित कर, कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन के केंद्र में भगवान को स्थापित करता है। यही श्रीमद्भागवतमहापुराण का यह शाश्वत जीवन-दर्शन है, जहां कर्म, ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे के परस्पर पूरक बनकर, मानव जीवन की सार्थकता और साफल्य प्रदान करते हैं।