काकभुशुण्डि के चरित्र में छिपा है सनातन धर्म का परम सत्य
सृष्टि के उद्भव में जिन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। संचालन में कुछ नया नहीं दिखा। लय में कोई दुख नहीं हुआ। संपूर्ण समत्व में स्थित रहते हैं योगवसिष्ठ के ...और पढ़ें

Kakabhushundi Katha: काकभुशुंडि की कथा।
स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। सनातन की अनंतता, अद्वितीयता, असंगता तथा अलौकिकता को आत्मसात किए बिना धर्म के मूल तत्व और उसके जीव मात्र के प्रति कल्याण और हितकारक दृष्टकोण को नहीं समझा जा सकता है। सृष्टि के विशाल परिवेश में हम अत्यंत लघु कालखंड में दिखाई देने वाले सूक्ष्मतम अंश हैं। दुर्भाग्यवश हम अपने अस्तित्व को इतना बड़ा मानने लगे हैं कि जिसके कारण ईश्वर जैसी अखंड सत्ता के लिए प्रमाण देने पड़ते हैं। मनुष्य को अपनी वैदिक परंपरा का स्वाध्याय करना चाहिए, ताकि वह अपने कार्यों और उपलब्धियों में ईश्वर की कृपा और उसके पूर्व संकल्प को देखकर अपने मिथ्या कर्तृत्व भाव से ऊपर उठकर संसार में प्रेम का संचार कर सके। इससे वह स्वयं को और अपने कार्यों को आकाश की तरह व्यापक बना सकता है। कर्तृत्व अहंकार के कारण जिसको न देख पाने के कारण वह मानसिक रोगी होता जा रहा है।
सनातन की ऋषि परंपरा
योगवासिष्ठ ग्रंथ पौराणिक वांगमय की श्रेष्ठतम संहिता है। इसमें गुरु वशिष्ठ स्वयं आत्मवृत्तांत सुनाते हुए भगवान श्रीराम से कहते हैं कि एक बार मैं स्वर्ग में इंद्र की सभा में था। वहां उपस्थित नारद जी ने अनेक चिरंजीवियों की कथा सुनाई। सभा में उपस्थित अत्यंत मृदुभाषी, अमानी शतातप मुनि ने सुमेरुगिरि पर्वत के ईशानकोण में कल्पतरु के एक कोटर में रहने वाले वायसराज भुशुंड जी की महिमा का उल्लेख किया। सनातन की ऋषि परंपरा का यह प्राण तत्व है कि सारे ऋषि दूसरे की महिमा का बखान करते हैं। महिमा शब्द का भाष्य आत्मप्रशंसा या अपनी महिमा बताना नहीं है।
वशिष्ठ जी ने अपना परिचय देते हुए केवल इतना कहा कि मेरा जन्म मेरे पिता ब्रह्मा के नाभिकमलयोनि से हुआ। मैं ब्रह्मा का सदाचार संपन्न मानस पुत्र हूं, पर वे भगवान के समक्ष जिस तरह की महिमा भुशुंड की बताते हैं, ऐसा शायद ही कहीं मिलता हो। भुशुंड के आश्रम में सहज रूप से शीतल मंद और सुगंधित वायु बह रही है। वशिष्ठ जी ने वहां पर ॐकार ध्वनि का श्रवण किया।
काकभुशुंडि का चरित्र
ब्रह्मविद्या से परिपूर्ण सत-असत का विभाजन सहज ही करने वाले ब्रह्मा के वाहन हंस पुत्रों को देखा। वहां निवास करने वाले देवताओं की स्तुति में स्वाहाकार की ध्वनि होती थी। राग, द्वेष, ममता और अहंकारमुक्त नित्य शुद्ध बुद्ध भुशुंड का बिल्कुल शांत स्वरूप उन्होंने देखा। सारे पुराणों में काकभुशुंडि जी ही मात्र ऐसे हैं, जो हर कल्प के दृष्टा होते हुए भी एक पल के लिए भी अपनी ब्रह्मनिष्ठा से विरत नहीं हुए।
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ब्रह्मवेत्ता की भक्ति का प्रमाण जैसा काकभुशुंडि का चरित्र है, वैसा निर्मल आकाश सरिस चरित्र दुर्लभ है। जिनकी उपमा के लिए कोष में कोई शब्द नहीं लिखा गया है। अनादि, अनंत, व्यापक और अखंड ही उनका स्वरूप है। वशिष्ठ जी शतातप से उनकी कथा सुनकर सुमेरु पर्वत पर आरोहण करके पहुंच गए थे।
गुण-दोषों का चिंतन
वशिष्ठ के प्रश्न करने पर भुशुंड जी कहते हैं, मैं अनगिनत बार सृष्टि का उद्भव, मध्य और लय का दृष्टा हूं। वे मध्य में रहने वाले अनंत थे। यह आज भी संभव है। प्राण और अपान के मध्य जो कुंभक है, वही साधक के जीवन का परम लक्ष्य है। यही मध्य है, यही समाधि है। कुंभक काल में व्यक्ति अपने भौतिक स्वरूप में स्थिति के स्थान पर यदि अपने कार्य, उपलब्धियों या संसार के गुण-दोषों का चिंतन करने लगे तो समझना चाहिए कि प्राण के साथ सूक्ष्मरूप में माया के कोई कीटाणु चित्त में प्रवेश कर गए होंगे।
अब वह साधक बैखरी या रेचक क्रिया के रूप में जो भी कार्य करेगा, उसमें माया का ही विस्तार होगा। जन समूह रूपी संसार को चूंकि कुछ भी नहीं पता है, इसलिए सभी लोग माया के अनुयायी बनकर माया का ही विस्तार कर अपने और संसार के विनाश के कारण बन जाते हैं।
समाधि में जीवन का अनुभव
आवश्यक है कि व्यक्ति स्वीकृति रूप संग्रह और त्याग रूप रेचक में भगवान की कृपा को देखे तो कुंभक रूप जो मध्य स्थिति है, उसमें आनंद, शांति, विश्राम, निस्पृहता, असंगता, मुक्ति का सुख साधक को सहज ही प्राप्त हो जाएगा। संग्रह और त्याग दोनों में अपनी स्वीकृति है। अपने स्व की स्वीकृति में समाधि और शुद्ध निष्पाप कर्म संभव ही नहीं है। काकभुशुंडि जी की इतनी आयु है कि न जाने कितनी बार उन्होंने सृष्टि का सृजन और लय देखा, सुमेरु को हिलते देखा, पर वे अपनी ब्रह्मनिष्ठा में सहज स्थित रहे। यही कारण था कि उन्होंने मध्य को ही धारण कर लिया था।
उनका न कुछ छूटा, न ही उन्हें कुछ मिला, परिणामस्वरूप वे विशुद्ध परमात्मा-चित्त के परम विश्रामरूप शांति को प्राप्त रहते थे। काकभुशुंडि जी की यही प्राप्ति और सुख चिरंजीवी है। मृत्यु जीवन की और शरीर की होती है, समाधि में जीवन का अनुभव ही नहीं है।
कमल समष्टि का दृष्टा है
कमल अपनी सुगंध देता है, पर किसी से दुर्गंध लेता नहीं है। इसका कारण है कि उसे देने और पाने का ज्ञान ही नहीं है। कमल समष्टि का दृष्टा है, पर जिसको देख रहा है उससे सर्वथा असंग है। कामना पूर्ण करने वाले जिस कल्पतरु की संसार कामना करता है भुशुंडि जी का उसी के कोटर में नित्य निवास है। भूत और भविष्य उनके चिंतन का विषय नहीं है। यद्यपि हर वर्तमान में भूत और भविष्य का योग निहित होता है, पर वह तब होता है जब उसमें हमारी जिज्ञासा होती है। नहीं तो भूत-भविष्य हमें देखते हैं, हम उनसे असंग रहते हैं। काकभुशुंडि प्राणक्रिया के निरोध से सदा सुखी, अंतर्मुख और ब्रह्मनिष्ठ रहते हैं। भाषा की शीतलता, स्वर की मधुरता, सौम्यता, प्राणिमात्र के हितैषी। वशिष्ठ जी ने राम से कहा, जब आकाश से मैंने यह देखा तो मैं वहां पर्वत पर उतर गया।
आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तापों से मुक्त परम बुद्ध भुशुंड जी ने विशिष्ठ का चरणोदक लिया, पाद प्रक्षालन किया। विनम्रतापूर्वक आने का कारण पूछा। यह प्रसंग ज्ञान और ज्ञानी के व्यावहारिक पूर्णता का है। ज्ञान, भक्ति और कर्म में यदि व्यावहारिकता का अभाव हो तो हमारा योग न तो ईश्वर से होगा न ही संसार मधुर लगेगा।
धर्म का प्रतिपादन
भारतीय पौराणिक वांगमय स्वयं में ही समस्त सनातन है, उसमें ज्ञानी का घटाकाश और मठाकाश स्वरूप दोनों परिपूर्ण होना चाहिए, तभी वह धर्म का प्रतिपादन और पालन कर पाएगा। पशु-पक्षी भले ही मनुष्य की तरह उन्नत न दिखाई दें, पर वे अपनी संहिता और परंपरा पर चलकर मनुष्य को मौन संकेत तो दे ही रहे हैं। हमारी संस्कृति ने कौए को भी सर्वाधिक महत्व देकर और गुरु वशिष्ठ एवं स्वयं भगवान श्रीराम तथा शंकर जी से उनकी प्रियता बताकर अपनी व्यापकता सिद्ध की है। संसार के जितने धर्मावलंबी श्रेष्ठ जन हैं उनके लिए यह पाठ वंदनीय है। जिसमें महाज्ञानी शतातप और वशिष्ठ जैसे लोग कौए के जीवन स्वरूप को स्वनामधन्य कर रहे हैं। भगवान श्रीराम ने इसीलिए गुरु वशिष्ठ को अपना गुरु स्वीकार किया।