शिवलिंग पर चढ़े जल को लांघना क्यों माना गया है वर्जित? जानिए इसके पीछे छिपी धार्मिक मान्यता और इसका महत्व
शिवलिंग पर अर्पित जल को लांघना धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से वर्जित माना गया है। जानिए इसके पीछे छिपी पौराणिक मान्यताएं। ...और पढ़ें

शिवलिंग की परिक्रमा के पीछे का रहस्य जानें

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में देवी देवताओं की परिक्रमा को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि परिक्रमा के बिना पूजा पूर्ण नहीं होती है। इसलिए किसी देवी-देवता की एक तो किसी की दो तो किसी-किसी की इससे भी अधिक परिक्रमा लगाने का विधान बताया गया है। लेकिन सभी देवी-देवताओं में केवल भगवान शिव ही हैं, जिनकी केवल आधी परिक्रमा ही की जाती है। शिव भक्तों के मन में यह सवाल हर बार उठता है, जब वे शिवलिंग पर जल अर्पित करने जाते हैं।
ऐसा भी कहा जाता है कि जो जल हम शिवलिंग पर अर्पित करते हैं, उसे कभी भी लांघना नहीं चाहिए। ऐसा क्यों बोला जाता है चलिए जानते हैं।
शिव-शक्ति का प्रतीक होता है शिवलिंग पर चढ़ा जल
शिवलिंग पर हम जो जल अर्पित करते हैं, वह शिव-शक्ति का प्रतीक माना जाता है। दरअसल, धार्मिक शास्त्रों में बताया गया है कि शिवलिंग भगवान शिव का प्रतीक हैं, वहीं शिवलिंग की जलाधारी को देवी पार्वती का हस्त-कमल कहा जाता है। ऐसे में जब हम शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं, तब जलधारी से निकलने वाले जल में भगवान शिव और देवी पार्वती दोनों की ऊर्जा आ जाती है। ऐसे में इस ऊर्जा को लांघना उचित नहीं होता है।
सोमसूत्र में होती है ऊर्जा
शिवलिंग में गौरीपीठ से अभिषेक किया गया जल बाहर की ओर आता है और जिस मार्ग से यह बहता है, उसे सोमसूत्र कहा जाता है। इस सूत्र को लांघना शिव जी की ऊर्जा का अपमान करना होता है। इसलिए शिव जी की परिक्रमा के वक्त सोमसूत्र के आते ही भक्तों के कदम रुक जाते हैं और परिक्रमा आधी ही हो पाती है। इसलिए शिव जी की परिक्रमा को चंद्र परिक्रमा भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि सोमसूत्र जो लांघ जाता है उसके शरीर और मन की ऊर्जा पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
इतना ही नहीं, शिव जी के अभिषेक से निकले हुए जल को इतना पवित्र माना जाता है कि लोग उससे आचमन की प्रक्रिया करते हैं।
अतः जब भी शिवलिंग पर जल चढ़ाएं, ऊपर बताई गई बातों का ध्यान रखें और केवल आधी परिक्रमा ही करें।
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