मनुष्य योनि के बाद आत्मा का क्या होता है? मृत्यु के बाद कैसे तय होता है अगला जन्म
मृत्यु के बाद आत्मा का अगला पड़ाव कर्मों पर निर्भर करता है, जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित है। मनुष्य योनि ...और पढ़ें

मृत्यु के बाद आत्मा का अगला जन्म कैसे होता है। (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हम सभी के मन में यह जिज्ञासा होती है कि मरने के बाद हम क्या दोबारा मनुष्य ही बनेंगे या फिर कोई पशु-पक्षी। लेकिन हिंदू धर्म के शास्त्रों जैसे श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 6 में बताया गया है कि आत्मा के लिए जीवन और मृत्यु एक निरंतर यात्रा है, जब तक कि उसे मोक्ष न मिल जाए। माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता, बल्कि वह अपने कर्मों के अनुसार एक नए शरीर को प्राप्त करती है। यह शरीर किसी मनुष्य या पशु-पक्षी का भी हो सकता है। एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषाचार्य चंद्रेश शर्मा के अनुसार, "मनुष्य योनि को कर्म योनि माना गया है, क्योंकि इसी जीवन में व्यक्ति अपने कर्मों से भविष्य की दिशा तय करता है। वहीं अन्य योनियों को भोग योनि कहा गया है।"
कर्मों के आधार पर मिलती है अगली योनि
हम कई बार बड़े बुजुर्गों के मुंह से यह बात सुन भी चुके हैं और यह काफी हद तक सत्य भी है कि व्यक्ति ने जीवनभर जैसे कर्म किए होते हैं, उसी के अनुरूप मृत्यु के बाद उसकी आगे की गति निर्धारित होती है। अच्छे, सात्विक और पुण्य कर्म करने वाली आत्मा को हमेशा अच्छा और उच्च लोक और श्रेष्ठ योनि प्राप्त होती है।
देव या गंधर्व योनि
जिन लोगों का जीवन सात्विक विचारों, अच्छे कर्मों, सेवा, दया और आध्यात्मिक साधना के साथ बीतता है, उनकी आत्मा को मृत्यु के बाद देव-गंधर्व जैसी योनियां मिल सकती हैं, ऐसी धार्मिक मान्यता श्रीमद्भगवद्गीता में बताई गई है।
दोबारा मनुष्य योनि
यदि व्यक्ति के कर्म सामान्य या मिश्रित हों और उसके कुछ अच्छे कर्मों का फल शेष हो, तो उसे दोबारा मनुष्य जन्म मिलने की मान्यता है। मनुष्य जीवन को विशेष इसलिए माना गया है, क्योंकि इसमें व्यक्ति को अपने कर्म सुधारने का मौका मिलता है।
पशु-पक्षी या अन्य योनि
अत्यधिक तामसिक कर्म, क्रूरता, स्वार्थ, हिंसा, हत्या और अपराध करके जीवन बिताता है, उसकी आत्मा को पशु, पक्षी, कीट या अन्य जीवों की योनि प्राप्त होती है। इसे पिछले कर्मों के फल के रूप में देखा जाता है।
क्या बार-बार मिल सकता है मनुष्य जन्म?
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 6 के श्लोक 41-42 में बताया गया है कि जो व्यक्ति अच्छे मार्ग पर चलकर जीवन बिताता है, उसे भी अपने शुभ कर्मों की वजह से बार-बार मनुष्य योनि में पुण्यवान या योगियों के परिवार में जन्म प्राप्त कर सकता है। इस तरह आत्मा को तब तक मनुष्य का जीवन मिलता रहता है, जब तक उसे मोक्ष न प्राप्त हो जाए।
अंतिम समय की भावना भी मानी जाती है महत्वपूर्ण
धार्मिक मान्यताओं में मृत्यु के समय मनुष्य के विचार और भावनाओं को भी महत्वपूर्ण माना गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति अंत समय में जिस जैसे भाव रखता है और जो भी सोचते हुए अपना शरीर त्यागता है, उसे उसी भाव के अनुरूप अगला जन्म प्राप्त होता है। इसलिए जीवनभर अच्छे कर्मों के साथ मन और विचारों को भी शुद्ध रखने पर जोर दिया जाना चाहिए।
मोक्ष है जन्म-मृत्यु से मुक्ति का मार्ग
चंद्रेश शर्मा बताते हैं, "आत्मा का अंतिम लक्ष्य बार-बार जन्म लेने के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करना है। जब मनुष्य अपने कर्मों को पूरी तरह से सुधार लेता है और ईश्वर की भक्ति और आत्मज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ता है, साथ ही उसे किसी भी तरह की मोह-माया नहीं होती, तब उसे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। "
अतः मनुष्य का जन्म बहुत ही दुर्लभ है और हमें इसका सम्मान करते हुए हमेशा अच्छे विचार और अच्छे कर्म करते रहना चाहिए।
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