आखिर कैसे पड़ा 'हरतालिका' तीज का नाम? पार्वती जी की इस कथा में छिपा है दिलचस्प रहस्य
हरतालिका तीज का नाम 'हरत' (हरण) और 'आलिका' (सखी) शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है 'सखियों द्वारा हरण ...और पढ़ें
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हरतालिका तीज का नामकरण रहस्य माता पार्वती की पौराणिक कथा से जुड़ा (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
हरतालिका नाम 'हरत' (हरण) और 'आलिका' (सखी) से बना।
पार्वती की सखियों ने उन्हें वन में छिपाकर तपस्या कराई।
शिव को पति रूप में पाने के लिए पार्वती ने व्रत किया।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का विशेष महत्व है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करती हैं। इस व्रत की एक प्रमुख परंपरा शिव-पार्वती की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर उनकी विधि-विधान से पूजा करना है।
यह व्रत हर साल भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस साल यह पर्व आज यानी 14 सितंबर को मनाया जा रहा है। सुखी वैवाहिक जीवन की कामना और सुयोग्य वर की इच्छा से यह व्रत रखा जाता है। इस व्रत के नाम को लेकर मन में एक सवाल आता है कि आखिर इसका नाम 'हरतालिका' ही क्यों रखा गया? आइए आपको बताते हैं इसके कारणों और इस नाम के मतलब के बारे में।
हरतालिका शब्द का अर्थ क्या है?
हरतालिका शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है 'हरत' और 'आलिका'। जिसका अर्थ है हरत यानी 'हरण' और आलिका यानी 'सखी' है। इस प्रकार हरतालिका शब्द का अर्थ है 'सखियों द्वारा हरण करना'।
शिव पुराण में लिखी हुई हरतालिका व्रत की कथा के अनुसार यह व्रत पहली बार माता पार्वती से भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए किया था। इस व्रत और तपस्या को करने के लिए माता पार्वती की सखियां उनका हरण करके उन्हें वन में ले गई थीं, जिससे माता पार्वती बिना किसी बाधा के अपनी तपस्या करें। तभी से इस व्रत का नाम 'हरतालिका' पड़ा।
शिव पुराण के अनुसार हरतालिका तीज व्रत की कथा
हरतालिका तीज की कथा के अनुसार, पार्वती जी की सहेलियां उनका अपहरण करके उन्हें घने जंगल में ले गईं क्योंकि उस समय माता पार्वती के पिता उनकी इच्छा के विपरीत उनका विवाह विष्णु जी से करना चाहते थे। उस समय माता पार्वती जी की सखियों ने उनका अपहरण कर उन्हें जंगल में छिपा दिया, जिससे माता पार्वती के पिता उनका विवाह उनकी इच्छा के विपरीत न कर पाएं। पार्वती जी शिव जी को मन ही मन अपना पति मान चुकी थीं।
इसलिए उनकी सखियों ने उनका साथ दिया और भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत का शिवलिंग बनाकर भोलेनाथ की तपस्या की।
माता पार्वती ने इस पूरे समय के दौरान अन्न का त्याग भी कर दिया था और पूरे 17 साल सिर्फ कंदमूल खाकर ही तपस्या की। पार्वती के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने माता पार्वती को दर्शन देकर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। उसी समय से यह व्रत अखंड सौभाग्य और अच्छे जीवनसाथी की कामना में महिलाओं और कुंवारी कन्याओं द्वारा रखा जाने लगा।
कैसे किया जाता है हरतालिका तीज का व्रत?
इस व्रत के पहले दिन महिलाएं अपने मायके जाती हैं या फिर मायके से उनके लिए सिंजारा भेजा जाता है जिसमें सुहाग की सभी चीजें होती हैं।
व्रत के दूसरे दिन महिलाएं और लड़कियां पति की दीर्घायु की कामना में निर्जला व्रत करती हैं और शिव मंदिरों में जाकर शिव जी की आराधना की जाती है। हरतालिका तीज की पूजा में मुख्य रूप से मिट्टी से बने शिवलिंग की पूजा की जाती है। इस पर्व के तीसरे दिन महिलाएं प्रातः स्नान करने के बाद शिव मंदिर में जाकर माता पार्वती को सोलह श्रृंगार चढ़ाती हैं और पानी पीकर व्रत का पारण करती हैं।
हरतालिका तीज का व्रत महिलाओं के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है और विधि-विधान के साथ पूजा करने से भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद मिलता है।
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