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    हरियाली तीज पर झूला झूलना क्यों माना जाता है शुभ? पढ़ें इस परंपरा का धार्मिक महत्व

    Updated: Tue, 11 Aug 2026 11:30 AM (IST)

    हरियाली तीज पर झूला झूलने की परंपरा का गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। यह राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम और शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है, साथ ...और पढ़ें

    हरियाली तीज पर झूला झूलने का महत्व: जानें धार्मिक और सांस्कृतिक कारण (Picture Credit: AI Generated)

    हरियाली तीज पर झूला झूलने का महत्व: जानें धार्मिक और सांस्कृतिक कारण (Picture Credit: AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हरियाली तीज का पर्व हिंदू धर्म में बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह शादीशुदा महिलाओं के लिए और ज्यादा खास होता है क्योंकि इस दिन महिलाएं पति की दीर्घायु की कामना में उपवास रखती हैं और माता पार्वती की पूजा करती हैं।

    यह व्रत कुंवारी लड़कियां भी रखती हैं जिससे उन्हें अच्छे वर की प्राप्ति हो सके। यूं कहा जाए कि यह प्रकृति, प्रेम और उमंग का अनूठा उत्सव है। यही नहीं इस दिन कई अलग परंपराएं भी निभाई जा रही हैं जो सदियों से चली आ रही हैं। इनमें से ही एक है झूला झूलने और झुलाने की परंपरा।

    सदियों से हरियाली तीज के दिन झूला झूलना अत्यंत शुभ माना जाता रहा है और आज के दौर में इसका चलन और ज्यादा बढ़ गया है। सावन के महीने में जब चारों ओर हरियाली छा जाती है, तब हाथों में मेहंदी लगाए हुए लड़कियां एक-दूसरे को झूला झुलाती हैं और इस उत्सव का आनंद उठाती हैं। आइए एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी श्री चंद्रेश शर्मा से जानते हैं इस प्रथा का मतलब और महत्व क्या है?

    धार्मिक मान्यताएं और कथा

    हरियाली तीज के दिन झूला झूलने की परंपरा के पीछे कुछ मुख्य धार्मिक कारण बताए जाते हैं जिसकी वजह से सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है।

    राधा-कृष्ण का दिव्य प्रेम

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के महीने में भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी वृंदावन के कदंब के वृक्षों पर सोने-चांदी के झूलों पर झूला झूलते थे। इसलिए कृष्ण के समय से लेकर आज भी हरियाली तीज पर झूला झूलना राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम का स्मरण कराता है। झूला झूलने और झुलाने की परंपरा अपने जीवन में उसी आनंद व प्रेम को आमंत्रित करने का प्रतीक है। यही नहीं मान्यता यह भी है कि इस दिन यदि पति-पत्नी एक दूसरे को झूला झुलाते हैं , तो आपसी प्रेम बढ़ता है।

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    शिव-पार्वती का पुनर्मिलन

    हरियाली तीज को माता पार्वती और भगवान शिव के पुनर्मिलन का दिन माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि मां पार्वती ने कठोर तपस्या के बाद इसी दिन शिव जी को पति के रूप में प्राप्त किया था। इसकी खुशी में समस्त देवियों और सखियों ने झूला झूलकर इसे उत्सव की तरह मनाया था। भगवान शिव और पार्वती के इस मिलन को आज भी लोग हर्ष और उल्लास में मनाते हैं और एक दूसरे को ख़ुशी से झूला झुलाते हैं।

    सांस्कृतिक और जीवन का संदेश

    सांस्कृतिक रूप से, झूला झूलना मन की चंचलता और विचारों के संतुलन का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह झूला झुलाने पर यह आगे और पीछे जाता है, उसी तरह जीवन में आने वाले सुख-दुख के उतार-चढ़ाव में संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है जिससे आगे चलकर जीवन में खुशहाली बनी रहे।

    तनाव से मुक्ति और उमंग

    हरियाली तीज के दिन झूला झूलने से शरीर में शुभ ऊर्जा का संचार होता है। झूला झूलते समय ताजी हवा और प्रकृति के निकट रहने से मानसिक तनाव दूर होता है, मन प्रसन्न रहता है और व्यक्ति के स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। इसी वजह से यह परंपरा वैवाहिक जीवन में नई उमंग और ताजगी भरने का काम करती है।

    हरियाली तीज पर झूला झूलने की परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी लोग इसका पालन करते आ रहे हैं। इस परंपरा से आपसी प्रेम तो बढ़ता ही है और जीवन में समृद्धि भी आती है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।