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    क्या हिंदू धर्म में महिलाएं भी बन सकती हैं पुजारी? ज्योतिषाचार्य ने बताए असली नियम

    Updated: Thu, 14 May 2026 12:31 PM (IST)

    क्या सनातन धर्म में महिलाओं को भी पुरोहित या पुजारी बनने का अधिकार है? जानें ज्योतिषाचार्य के विचार और सनातन परंपरा में महिलाओं की भूमिका क्या है। ...और पढ़ें

    जानें सनातन धर्म की प्राचीन परंपरा (AI-Generated Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। समाज में जब भी 'पंडित', 'पुरोहित' या 'पुजारी' शब्द का जिक्र होता है, तो अक्सर हमारे दिमाग में स्वाभाविक रूप से एक पुरुष की छवि ही उभर कर आती है। सदियों से चली आ रही कुछ सामाजिक व्यवस्थाओं और रूढ़िवादी मान्यताओं ने यह धारणा बना दी है कि मंदिरों में पूजा-पाठ, बड़े यज्ञ और विवाह जैसे धार्मिक अनुष्ठान कराने का अधिकार केवल पुरुषों के पास ही सुरक्षित है।

    लेकिन, जैसे-जैसे समय बदल रहा है और महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी जगह बना रही हैं, यह सवाल बार-बार प्रासंगिक होकर सामने आता है कि क्या हिंदू धर्म में औरतें भी पुजारी हो सकती हैं? क्या हमारे शास्त्र उन्हें इस बात की अनुमति देते हैं?

    सनातन परंपरा में पुरोहित: लिंग नहीं, योग्यता है सर्वोपरि

    आज के समय में जब धर्म और प्राचीन परंपराओं को लेकर फिर से सही ज्ञान का प्रसार हो रहा है, तो कई विद्वान और धर्मगुरु इस भ्रम को मजबूती से तोड़ रहे हैं। इसी विषय पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए ज्योतिषाचार्य चंद्रेश शर्मा ने बताया कि हिंदू धर्म या सनातन संस्कृति में ऐसी कोई भी पाबंदी नहीं है कि केवल पुरुष ही पुरोहित बन सकते हैं। हमारे धर्म में किसी भी पद या जिम्मेदारी का आधार हमेशा से योग्यता को ही माना गया है। प्राचीन काल से ही ऋषिकाओं और विदुषी महिलाओं का उल्लेख मिलता है जिन्होंने वेदों और धार्मिक अनुष्ठानों में अपना अमूल्य योगदान दिया है।

    mahila pujari

    (AI-Generated Image)

    आज भी भारत के कई राज्यों में कन्याओं को वेदों और शास्त्रों की विधिवत शिक्षा दी जा रही है। यह इस बात का प्रमाण है कि सनातन धर्म लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता, बल्कि ज्ञान और क्षमता को सबसे ऊपर रखता है। जब एक योग्य स्त्री धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराती है, तो वह समाज को एक नई दिशा और प्रेरणा देने का काम करती है।

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    वैदिक काल की ऋषिकाएं

    अगर हम सनातन धर्म की गहरी मान्यताओं की ओर देखें, तो सच्चाई इस आम धारणा से बिल्कुल अलग नजर आती है। वैदिक काल में गार्गी (ऋषि वचकनु की पुत्री), मैत्रेयी (ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नी) और लोपामुद्रा {ऋषि अगस्त्य की पत्नी, ऋग्वेद के मंत्रों की रचयिता (ऋषिका)}, जैसी कई विदुषी महिलाओं और ऋषिकाओं का स्पष्ट जिक्र मिलता है, जिन्होंने न केवल वेदों की जटिल ऋचाओं की रचना की, बल्कि बड़े-बड़े यज्ञों और दार्शनिक शास्त्रार्थों में भी प्रमुखता से हिस्सा लिया।

    इसका सीधा सा अर्थ है कि सनातन परंपरा में आध्यात्मिक अधिकार के लिए ज्ञान और वैराग्य का महत्व था, लिंग का नहीं। महिलाओं को पूजा-पाठ या पुरोहित के काम से दूर रखना धर्म का नहीं, बल्कि बहुत बाद में समाज द्वारा रची गई पितृसत्तात्मक व्यवस्था का परिणाम था।

    देश भर में तैयार हो रहीं महिला पुरोहित

    यह सुखद बदलाव अब केवल किताबी बातों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर भी साफ दिखने लगा है। आज महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दक्षिण भारत और उत्तर प्रदेश सहित देश के कई गुरुकुलों और संस्थानों में कन्याओं को कर्मकांड, संस्कृत और वेदों की विधिवत शिक्षा दी जा रही है।

    महिला पुरोहित अब शादियों, गृह प्रवेश और अन्य बड़े अनुष्ठानों को पूरी शुद्धता और स्पष्ट मंत्रोच्चार के साथ सफलतापूर्वक संपन्न करा रही हैं और लोग उन्हें पूरे सम्मान के साथ स्वीकार भी कर रहे हैं।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।