श्रीमद्भगवद्गीता में बताए गए ऐसे 5 सत्य जो आपको जरूर जानने चाहिए, जीवन को मिल सकती है नई दिशा
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा बताए गए 5 ऐसे सत्य हैं जो जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। ...और पढ़ें

भगवद्गीता के 5 सत्य जो आपके जीवन को बदल सकते हैं (Picture Credit: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सदियों पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्री कृष्ण ने अपने प्रिय भक्त अर्जुन को भगवद्गीता का महान आध्यात्मिक ज्ञान दिया था। इसे एक ग्रंथ का रूप दिया गया और इस ग्रंथ में ऐसी कई बातें लिखी हैं जो जीवन जीने के सही तरीके को बताती हैं।
श्री कृष्ण ने धर्म से जुड़े कई ऐसे पाठ पढ़ाए जिसकी वजह से अर्जुन को युद्ध में विजय मिली। सब कुछ ईश्वर का बनाया है और किसी भी हार या जीत पर हमारा कोई वश नहीं चलता है। ऐसे न जाने कितने उपदेश भगवद्गीता में गहराई से बताए गए हैं। वहीं इस महान ग्रंथ में कुछ ऐसी बातें भी लिखी हैं, जो हर मनुष्य को स्वीकार लेनी चाहिए। इन उपदेशों का पालन करने से व्यक्ति जीवन में सफल होता है। आइए आपको बताते हैं गीता के कुछ ऐसे सत्य हैं जिसके बारे में यदि कोई जान लेता है, तो उसके जीवन की दिशा ही बदल सकती है।
कर्म करो फल की इच्छा मत करो
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ कर्म ही सबसे बड़ा सच है और इसी वजह से आपको हमेशा सिर्फ कर्म करते रहना चाहिए, फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। हममें से ज्यादातर लोग अपने कर्मों पर ध्यान नहीं देते हैं और ऐसा सोचते हैं कि जल्द से जल्द ही सफलता मिल जाए।
ऐसा करना ठीक नहीं है बल्कि आपको अपने कर्मों पर ही भरोसा करके आगे बढ़ना चाहिए, न कि फल की चाह में कर्मों से पीछे हटना चाहिए। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।
परमात्मा ही सब कुछ है
गीता के अध्याय 7 के 19 श्लोक में बताया गया है कि 'वासुदेव सर्वम'। अर्थात जो कुछ इस दुनिया में है वह सब ईश्वर ही है। जब हम दूसरों में कमियां देखते हैं, तब हम अपनी आत्मा और विचारों को छोटा कर लेते हैं।
वहीं जब आप यह सोचते हैं कि हर एक व्यक्ति में परमात्मा का वास है तो आपका ह्रदय विशाल हो जाता है। आपके लिए यह सत्य सीकरण जरूरी है कि आप जीवन में जो कुछ भी कर लें, परमात्मा ही सर्वस्व है और उसके बिना कुछ भी संभव नहीं है।
इंद्रियों पर नियंत्रण है जरूरी
श्रीमद्भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय का एक श्लोक है "ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥" इस श्लोक का मतलब है कि इस जीवलोक की समस्त आत्माएं ईश्वर का ही अंश हैं, लेकिन माया के बंधन की वजह से वो इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर पाती हैं। अगर कोई व्यक्ति अपनी छः इन्द्रियों को वश में कर लेता है तो अवश्य ही उसे सफलता मिलती है।
हमेशा धर्म का साथ देना चाहिए
श्री कृष्ण अर्जुन से गीता के चौथे अध्याय के 7वें श्लोक में कहते हैं कि "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥" इसका मतलब है कि- जब-जब धर्म की हानि होती है और इस पृथ्वी पर अधर्म बढ़ते हैं उस समय श्री कृष्ण इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। वो सज्जन पुरुषों की रक्षा और अधर्मियों का विनाश करने के लिए धरती पर प्रकट होते हैं। अतः आपको हमेशा धर्म का ही साथ देना चाहिए और अधर्म से दूरी बना लेनी चाहिए। यह व्यक्ति के जीवन का एक बड़ा सत्य है, जिसे स्वीकार करना जरूरी है।
मन पर नियंत्रण है जरूरी
भगवत गीता के दूसरे अध्याय के 48 वें श्लोक में बताया गया है कि- "योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥"
इसका मतलब यह है कि- श्री कृष्ण कहते हैं हमेशा स्थिर मन से कर्म करो। सबसे बड़ी लड़ाई भीतर की होती है न कि बाहर की। जिस दिन आप मन पर नियंत्रण रखना सीख जाएंगे, उस दिन पूरी दुनिया आपके नियंत्रण में आ सकती है।
अगर कोई व्यक्ति भगवत गीता के इन 5 सत्यों को स्वीकार लेता है तो उसे जीवन का सही तरीका पता चल जाता है और ऐसा ही व्यक्ति जीवन में सफल होता है।
यह भी पढ़ें- गीता की 5 सीखें जो आपका टूटता हुआ आत्मविश्वास वापस जगा देंगी
यह भी पढ़ें- गीता के अनमोल वचन: श्रीकृष्ण की ये 5 बातें बदल देंगी आपकी सोच, आलस्य छोड़ कर्म को समझेंगे पूजा
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।
