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गीता की 5 सीखें जो आपका टूटता हुआ आत्‍मविश्‍वास वापस जगा देंगी

Published: Wed, 02 Sep 2026 01:50 PM (IST)

जब आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगे, तो श्रीमद्भगवद्गीता की 5 सीखें आपको भीतर से मजबूत बना सकती हैं। चलिए इनके बारे में विस्‍तार से जानते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता की ये 5 सीखें । (Picture Credit- AI Generated)

श्रीमद्भगवद्गीता की ये 5 सीखें । (Picture Credit- AI Generated)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जीवन में कई बार ऐसा समय आता है, जब लगातार असफलताओं, परेशानियों या दूसरों की बातों के कारण हमारा आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगता है। हमें अपनी क्षमताओं पर विश्‍वास नहीं रहता है। हम खुद पर ही भरोसा नहीं कर पाते हैं कि कोई काम कर पाएंगे या नहीं। कई बात तो ऐसा भी लगता है कि हम कुछ भी कर लें, हमें कभी भी सफलता नहीं मिलेगी । ऐसे समय में श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाएं हमें भीतर से मजबूत बनने की प्रेरणा दे सकती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में जो ज्ञान दिया, उसमें जीवन की कई समस्याओं का समाधान छिपा है। गीता की ये 5 सीखें हमें खुद पर भरोसा करना और मुश्किल परिस्थितियों में आगे बढ़ना सिखाती हैं।

कर्म पर ध्यान दें, फल की चिंता न करें

गीता का यह सबसे प्रसिद्ध संदेश है कि मनुष्य का अधिकार केवल उसके कर्म पर है। कर्म करने से उसे फल क्‍या मिलेगा यह निर्णय केवल समय और ईश्‍वर के भरोसे छोड़ा जा सकता है। जब हम किसी काम को शुरू करने से पहले ही उसके परिणाम के बारे में सोचने लगते हैं तब हमारा मन काम की जगह उससे मिलने वाले नतीजे पर टिक जाता है। हमारे मन में अलग-अलग तरह के विचार आने लगते हैं। कई बार हम पहले से इस बात की चिंता करने लगते हैं, कि हमें काम में सफलता मिलेगी या नहीं। लेकिन वहीं हम ऐसा सोच लें कि हमें केवल अपना कर्म करना है, तो हमरा मन भटकता नहीं है और असफलता का डर हमारे आत्मविश्वास को कमजोर नहीं कर पता है। श्री कृष्‍ण कहते हैं कि आपने ईमानदारी और पूरी मेहनत से काम किया है, तो परिणाम तो निश्चित ही मिलेगा, ज्‍यादा सोचकर खुद को परेशान न करें।

मन को अपना मित्र बनाएं

गीता में मन को बहुत शक्तिशाली माना गया है। नियंत्रित मन हमारा मित्र बन सकता है, जबकि अनियंत्रित मन हमारे लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। जब मन में बार-बार नकारात्मक विचार आएं, तो उनसे डरने के बजाय खुद को समझने की कोशिश करें। खुद को याद दिलाएं कि एक बुरा अनुभव आपकी पूरी जिंदगी बरबाद नहीं कर सकता है। अपने विचारों को शुद्ध और अच्‍छा रखने से आपको आत्‍मविश्‍वास मजबूत होता है।

आत्मा अजर और अमर है

गीता में श्रीकृष्ण आत्मा को अजर और अमर बताया गया है। आत्मा कभी भी नष्‍ट नहीं होती है। गीता का यह संदेश जो व्‍यक्ति समझ जाता है, उसे हमेशा इस बात का अंदाजा रहता है कि उसे हर परिस्थिति में खुद को खुश रखना है क्‍योंकि कोई भी हार, कोई भी कठिन परिस्थिति आपके जीवन का अंत नहीं है। अपने अस्तित्‍व को बनाए रखने के लिए कभी भी हार नहीं माननी है। असफलता से डरकर अपनी पहचान को मिटाना नहीं है। बल्कि पूरी हिम्‍मत जुटाकर दोबारा खड़ा होना है और विश्‍वास के साथ आगे बढ़ना है।

बदलाव को स्वीकार करें

जीवन में कोई भी परिस्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। सुख के बाद दुख और कठिन समय के बाद अच्छे समय का आना जीवन का हिस्सा है। इसलिए अगर आज का समय आपके लिए मुश्किल है, तो यह जरूरी नहीं कि कल भी ऐसा ही हो। बुरे समय में धैर्य रखें और अपने प्रयास जारी रखें। परिस्थितियां बदल सकती हैं, इसलिए कठिन दौर को देखकर अपना आत्मविश्वास न खोएं।

खुद को पहचानें और अपनी राह चुनें

गीता में स्वधर्म का विशेष महत्व बताया गया है। इसका अर्थ अपने कर्तव्य और अपनी प्रकृति को समझकर उसके अनुसार जीवन जीना चाहिए बताया गया है। हर व्यक्ति की क्षमता और परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए लगातार दूसरों से अपनी तुलना करना आपके आत्मविश्वास को कमजोर कर सकता है। दूसरों की सफलता देखकर निराश होने के बजाय अपनी ताकत पहचानें और अपनी राह पर ईमानदारी से आगे बढ़ें।

अत: गीता की ये शिक्षाएं हमें याद दिलाती हैं कि आत्मविश्वास केवल सफलता मिलने से नहीं आता, बल्कि खुद को जीवन की परिस्थितियों में मजबूत बनाए रखने से आता है।

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