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मिट्टी के नहीं, यहां पूजे जाते थे असली नाग! जानिए महाराष्ट्र के बत्तीस शिराला की अनोखी परंपरा

Published: Sun, 16 Aug 2026 01:36 PM (IST)

महाराष्ट्र के सांगली जिले के बत्तीस शिराला गांव में नाग पंचमी पर जीवित सांपों की पूजा की अनोखी परंपरा थी। ...और पढ़ें

महाराष्ट्र के बत्तीस शिराला गांव में थी जीवित सांपों की पूजा की परंपरा

महाराष्ट्र के बत्तीस शिराला गांव में थी जीवित सांपों की पूजा की परंपरा

HighLights

  1. शिराला गांव में जीवित सांपों की पूजा की परंपरा।

  2. कोर्ट के आदेश से 2002 में इस पर प्रतिबंध लगा।

  3. ग्रामीण आज भी सांपों को देवता मानकर पूजते हैं।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर साल श्रावण मास की पंचमी तिथि पर देशभर में नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 17 अगस्त 2026, सोमवार के दिन मनाया जाएगा। देशभर में नाग पंचमी कई तरह से मनाई जाती है।

जहां कुछ जगहों पर नाग देवता की पूजा की जाती है, वहीं कुछ स्थानों पर जीवित सांपों की पूजा की जाती है। यह सुनने में थोड़ा हैरान कर सकता है लेकिन यह पूरी तरह सच है।

बत्तीस शिराला में थी जीवित सांपों की पूजा की परंपरा

भारत में एक ऐसी भी जगह है, जहां नाग पंचमी के मौके पर जीवित सांपों की पूजा की जाती है। महाराष्ट्र के सांगली जिले का बत्तीस शिराला गांव जहां कई सालों से जिंदा नागों की पूजा की जाती है। हालांकि कि कोर्ट के आदेश के बाद इस गांव में जीवित सांपों की पूजा पर प्रतिबंध लग चुका है, लेकिन यहां आज भी लोगों को जिंदा सांप दिख जाता है, तो वे उनकी पूजा करते हैं।

शिराला गांव के लोग सांपों को देवता के रूप में पूजते हैं, उन्हें मारना यहां पाप माना जाता है। गांव की प्रत्येक महिला नाग देवता को अपना भाई बताती है। उसके लिए व्रत रखती है और सांपों के पूजा के बाद ही व्रत का पारण करती है।

गांव से जुड़ी प्रचलित लोक कथा

इस गांव में एक लोककथा काफी प्रचलित है कि, एक बार नाग पंचमी के मौके पर गांव में गोरखनाथ महाराज आए और गांव की महिलाओं द्वारा भिक्षा देने में देरी कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि, वे सभी अपने घरों में मिट्टी के सांपों की पूजा में व्यस्त थीं।

तब उन्होंने कहा कि, वे जीवित नाग की बजाय मिट्टी के नाग की पूजा क्यों कर रही हैं। तब से लेकर शिराला में जीवित नागों की पूजा की परंपरा निभाई जाने लगी। यहां के लोगों का मानना है कि, नाग घर में भी आ जाए तो वह किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता है।

2002 से जीवित सांपों की पूजा पर रोक

साल 2002 से शिराला में जीवित सांपों की पूजा पर पूरी तरह से रोक लगाई जा चुकी है। इससे पहले सांपों की पूजा पहले अंबमाता मंदिर में की जाती थी, फिर घर-घर जाकर और बाद में ट्रैक्टर के जरिये जुलूस निकाला जाता था।

अदालत के हस्तक्षेप के बाद अब गांव में सांपों की प्रतिमा की पूजा की जाती है। पहले नाग पंचमी अंबमाता मंदिर के बाहर एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे मनाई जाती थी। सांपों का जुलूस बैलगाड़ी में निकाला जाता था।

21 सब्जियों को चढ़ता है प्रसाद

शिराला गांव में कोतवाल परिवार सांपों को 21 सब्जियों का प्रसाद अर्पित करते हैं। जिनमें चावली, मेथी, शेपू, तांबड़ा, कद्दू, अमरंथ, शेवगा, बैंगन, डोडका, भिंडी, गवारी, श्रावण घेवड़ा, वटाना, वर्णा, पत्ता गोभी, फूल गोभी, टमाटर, मूली, आलूवाड़ी, बिन और अचार शामिल हैं।

इस गांव के लोग सांपों को इतना मानते हैं कि, अगर कोई सांप उन्हें घायल अवस्था में दिख जाता है, तो वह उसका इलाज करते हैं और वन विभाग की देखरेख में रखते हैं। ठीक होने के बाद उसे फिर से जंगलों में छोड़ दिया जाता है। यदि शिराला क्षेत्र के किसी गांव या घर में कोबरा पाया जाता है, तो गांव के निवासी उसे पकड़कर जंगलों में छोड़ देते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।