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    अक्षय तृतीया 2026: इस सिद्ध स्तोत्र का पाठ खोल देगा बंद किस्मत के ताले, मां लक्ष्मी खुद आएंगी आपके द्वार

    Updated: Sat, 18 Apr 2026 04:51 PM (GMT+05:30)

    अक्षय तृतीया पर कनकधारा स्तोत्र (Kanakdhara Stotra) के पाठ का बहुत बड़ा महत्व है। ...और पढ़ें

    Akshaya Tritiya 2026: कनकधारा स्तोत्र का पाठ। (Ai Generated Image)

    Akshaya Tritiya 2026: कनकधारा स्तोत्र का पाठ। (Ai Generated Image)

    HighLights

    1. अक्षय तृतीया पर कनकधारा स्तोत्र के पाठ को बहुत शुभ माना गया है

    2.  बंद किस्मत को खोलने के लिए यह एक सिद्ध उपाय है

    3. इस साल अक्षय तृतीया 19 अप्रैल को मनाई जाएगी

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि यानी अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना जाता है। इस दिन किए गए किसी भी शुभ काम, दान और मंत्र जाप का फल कभी समाप्त नहीं होता है। इस साल अक्षय तृतीया का पर्व 20 अप्रैल को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर इस महामुहूर्त पर आप अपनी आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते हैं या लंबे समय से रुके हुए कामों को पूरा करना चाहते हैं, तो 'कनकधारा स्तोत्र' का पाठ करना सबसे अचूक उपाय माना गया है।

    ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र के प्रभाव से दरिद्रता का नाश होता है और बंद किस्मत के ताले खुल जाते हैं। आइए जानते हैं कनकधारा स्तोत्र का महत्व और इसके पाठ की सही विधि।

    पाठ करने की विधि (Puja Vidhi)

    • अक्षय तृतीया की सुबह सूर्योदय के समय या शाम को गोधूलि बेला में इस स्तोत्र का पाठ करना सबसे अधिक फलदायी होता है।
    • स्नान के बाद पीले या गुलाबी रंग के वस्त्र धारण करें।
    • घर के मंदिर में मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं।
    • अगर आपके पास श्रीयंत्र है, तो उसे सामने रखें और उसका कुमकुम से तिलक करें।
    • मां लक्ष्मी को कमल का फूल या गुलाब अर्पित करें।
    • पूरी श्रद्धा और सही उच्चारण के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
    • अगर संस्कृत पढ़ने में कठिनाई हो, तो इसका हिंदी अनुवाद भी पढ़ा जा सकता है।
    • आरती से पूजा को पूर्ण करें।
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    ।। श्री कनकधारा स्तोत्र ।।

    ''अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।

    अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।

    मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।

    माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।

    विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।

    ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।

    आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।

    आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।

    बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।

    कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।

    कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।

    मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।

    प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।

    मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।

    दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।

    दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।

    इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।

    दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।

    गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।

    सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।

    श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।

    शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।

    नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।

    नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।

    सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।

    त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।

    यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।

    संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।

    सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।

    भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।

    दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।

    प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।

    कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।

    अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।

    स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।

    गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:''।।

    ।। इति श्री कनकधारा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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