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    ब्रिटिश क्रूरता का काला पन्ना! अमृतसर के अजनाला के 282 अमर शहीदों को राष्ट्रीय सम्मान व न्याय देने की उठी मांग

    Updated: Sun, 02 Aug 2026 07:15 AM (IST)

    इतिहासकार सुरिंदर कोछड़ ने 1857 के अजनाला हत्याकांड के 282 भारतीय सैनिकों के अवशेषों के सम्मानजनक विसर्जन और ऐतिहासिक वस्तुओं के लिए संग्रहालय की मांग ...और पढ़ें

    कालियां वाला खूंह से निकले सिक्के व शहीदों के सिर।

    कालियां वाला खूंह से निकले सिक्के व शहीदों के सिर।

    HighLights

    1. 1857 के अजनाला हत्याकांड के 282 सैनिकों का बलिदान।

    2. इतिहासकार सुरिंदर कोछड़ ने सम्मान की मांग की।

    3. शहीदों के अवशेषों का विसर्जन, संग्रहालय स्थापित हो।

    नितिन धीमान, अमृतसर। अमृतसर जिले के अजनाला की धरती आज भी देश के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे दर्दनाक अध्यायों में से एक की गवाह मानी जाती है। एक अगस्त 1857 को हुए अजनाला हत्याकांड में बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की 26वीं रेजिमेंट के 282 भारतीय सैनिकों को तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर फ्रेडरिक एच. कूपर के आदेश पर एक सूखे कुएं में दफना दिया गया था।

    इस घटना की 169वीं बरसी पर इतिहासकार एवं शोधकर्ता सुरिंदर कोछड़ ने इन वीर सैनिकों की शेष अस्थियों का पूरे सम्मान के साथ विसर्जन कराने और उनसे जुड़े ऐतिहासिक अवशेषों के संरक्षण के लिए विशेष संग्रहालय स्थापित करने की मांग उठाई है।

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    जानकारी देते हुए इतिहासकार सुरिंदर कोछड़।

    तोहफे के लिए दिया गया भारतीय सैनिक

    इतिहासकार सुरिंदर कोछड़ के अनुसार, अंग्रेजी शासन की क्रूरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गिरफ्तार सैनिकों में से केवल एक घायल सैनिक को जीवित रखा गया था, ताकि उसे महारानी विक्टोरिया के लिए तोहफे के रूप में पेश किया जा सके।

    हालांकि बाद में उसे भी लाहौर छावनी में तोप से उड़ा दिया गया। उन्होंने कहा कि यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

    कुएं में डाला गया चूना व कोयला

    कोछड़ ने बताया कि सैनिकों के शवों को जल्द गलाने के उद्देश्य से कुएं में चूना और कोयला भी डलवाया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि तत्कालीन अधिकारी इस घटना का उल्लेख गुरुमुखी, शाहमुखी और अंग्रेजी में लोहे की पट्टिका पर करवाना चाहता था, लेकिन यह योजना पूरी नहीं हो सकी।

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    उन्होंने बताया कि उनकी वर्षों की शोध के आधार पर 28 फरवरी 2014 को स्थानीय लोगों और गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के सहयोग से उस ऐतिहासिक कुएं की खुदाई करवाई गई थी। खुदाई के दौरान बड़ी संख्या में सैनिकों के कंकाल और कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक वस्तुएं बरामद हुई थीं। इस शोध कार्य के लिए उन्हें पंजाब सरकार की ओर से राज्य पुरस्कार प्रमाणपत्र से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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    सैनिकों का सामान भी निकला था 

    खुदाई में मिले अवशेषों में शेरमुखी कड़े, विक्टोरिया पदक, सोने की अंगूठियां, चांदी का बकल, लॉकेट, ताबीज, विभिन्न काल के सिक्के, रुद्राक्ष, सोने के आभूषण, बेल्ट के बकल और अन्य धातु की वस्तुएं शामिल थीं। इतिहासकार का कहना है कि ये सभी वस्तुएं देश के स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं और इन्हें सुरक्षित रखने की जरूरत है।

    उन्होंने केंद्र और पंजाब सरकार से मांग की कि इन ऐतिहासिक वस्तुओं को पुरातत्व विभाग के अधीन किसी विशेष संग्रहालय में प्रदर्शित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस बलिदान और इतिहास की सच्चाई से परिचित हो सकें।

    अभी भी संरक्षित रखी गई हैं अस्तियां

    इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से अपील की कि अजनाला गुरुद्वारा, पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सुरक्षित रखी गई सैनिकों की शेष अस्थियों का डीएनए सहित आवश्यक वैज्ञानिक परीक्षण पूरे हो चुके हैं। अब इन अस्थियों का धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार सम्मानपूर्वक विसर्जन कराया जाना चाहिए।

    इतिहासकार का कहना है कि इन 282 वीर सैनिकों का बलिदान केवल पंजाब ही नहीं, बल्कि पूरे देश की अमूल्य विरासत है। उन्हें सम्मान देना और उनके इतिहास को संरक्षित रखना देश का नैतिक दायित्व है, ताकि स्वतंत्रता के लिए दिए गए उनके सर्वोच्च बलिदान को आने वाली पीढ़ियां हमेशा याद रख सकें।

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