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    चुनाव में मौसम बन सकता है गेम चेंजर, गर्मी-तूफान से बदल सकता है वोटिंग का पैटर्न

    Updated: Sun, 05 Apr 2026 09:43 AM (IST)

    अप्रैल में भारत के पांच राज्यों में होने वाले चुनावों पर मौसम और जलवायु परिवर्तन का गहरा असर पड़ सकता है। भीषण गर्मी, उमस और मॉनसून वोटिंग पैटर्न को प ...और पढ़ें

    प्रतीकात्मक फोटो।

    प्रतीकात्मक फोटो।

    HighLights

    1. अप्रैल चुनावों में मौसम बन सकता है निर्णायक कारक।

    2. गर्मी, तूफान, बारिश से मतदान प्रभावित होने की आशंका।

    3. चुनाव आयोग ने मतदान समय में किए बदलाव।

    डिजिटल डेस्क,नई दिल्ली। अप्रैल में भारत के पांच राज्यों में चुनाव है। इस दौरान 17.4 करोड़ वोटर वोट डालने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में एक सवाल उठता है कि, क्या मौसम और जलवायु परिवर्तन का इसपर कोई असर पड़ेगा। यह एक कम दिखाई देने वाली लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में निर्णायक ताकत रखती है।

    वोट डालने की प्रक्रिया को बदल सकता है मौसम

    पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में कुल 824 निर्वाचन क्षेत्र है। 2.19 लाख से ज्यादा मतदान केंद्र हैं। 25 लाख से ज्यादा चुनाव अधिकारियों की तैनाती की गई है। इस प्रक्रिया में गर्मी, उमस और मॉनसून वोट डालने की पूरी प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकती है।

    पिछले 5 सालों में तेजी से बदला है मौसम

    भारत में अप्रैल का महीना लंबे समय से मॉनसून से पहले के दौर की शुरुआत का प्रतीक रहा है। एक ऐसा समय जब गर्मी बढ़ती है और कभी-कभी तूफान भी आते हैं। हालांकि, अब यह सिलसिला धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के डेटा से पता चलता है कि पिछले पांच सालों में अप्रैल का मौसम तेजी से बदला है। तापमान लगातार सामान्य से ज्यादा रहा है।

    अप्रैल में कही बारिश तो कही हीटवेव

    अप्रैल 2022 का महीना सबसे गर्म महीनों में से एक था। जब तापमान औसत से 1.36°C ज्यादा था। इसके बाद के सालों में बारिश में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। एक साल कमी, तो अगले साल ज्यादा बारिश हुई। इसके साथ ही तूफान और बिजली गिरने की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई। चुनाव वाले राज्यों के लिए, यह अस्थिरता ठोस जोखिमों में बदल जाती है।

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    IMD के ताजा पूर्वानुमान की माने तो मतदान से पहले पश्चिम बंगाल और असम में बड़े पैमाने पर बारिश और गरज के साथ बौछारें पड़ेंगी। ये तूफान, जिनके साथ अक्सर बिजली भी गिरती है। परिवहन को बाधित कर सकते हैं। बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकते हैं और मतदाताओं को मतदान से दूर रख सकते हैं। खासकर ग्रामीण और बाढ़-संभावित जिलों में।

    election weather inside

    पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में, मॉनसून से पहले आने वाले इन तूफानों को 'नॉर्वेस्टर' या 'काल बैसाखी' के नाम से जाना जाता है। ये तूफान कम समय के लिए आते हैं, लेकिन इतने जोरदार होते हैं कि भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
    दक्षिण की ओर, एक अलग तरह का खतरा मंडरा रहा है।

    तमिलनाडु और केरल भीषण गर्मी का सामना करने के लिए तैयार हो रहे हैं, जिसे ज्यादा नमी और भी बढ़ा रही है। ऐसी स्थितियां "वेट-बल्ब" तापमान के जोखिम को बढ़ा देती हैं। यह एक खतरनाक स्थिति है जिसमें मानव शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए संघर्ष करता है, जिससे गर्मी से थकावट और लू लगने की संभावना बढ़ जाती है।


    जलवायु पैटर्न में बदलाव अब कोई सामान्य घटनाएं नहीं

    पूर्वी तट के साथ-साथ, जिसमें पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के कुछ हिस्से शामिल हैं। सामान्य से ज्यादा दिनों तक लू चलने की उम्मीद है। यह पहले से ही चुनौती पूर्ण चुनावी प्रक्रिया पर दबाव की एक और परत जोड़ देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये बदलाव अब कोई सामान्य घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक जलवायु पैटर्न का हिस्सा हैं।

    भारत के चुनाव अधिकारियों ने इस नई हकीकत के हिसाब से खुद को ढालना शुरू कर दिया है। भारत के चुनाव आयोग ने जल्दी वोट डालने के समय को बढ़ा दिया है। जो कि अब आमतौर पर सुबह 7 बजे से शाम तक रहता है। ताकि वोटर तेज गर्मी से बच सकें। रियल-टाइम पोलिंग स्टेशन ट्रैकर का मकसद भीड़ कम करना है, जबकि घर से वोट डालने की सुविधा कुछ खास कमजोर तबकों के लिए बढ़ा दी गई है।

    इन सब बातों से पता चलता है कि अप्रैल 2026 में, वोट डालने की प्रक्रिया तो वैसी ही रहेगी। लेकिन जिस माहौल में यह सब हो रहा है, वह बदल रहा है। इससे यह बात साफ है कि जलवायु परिवर्तन अब चुनावों के लिए महज एक दूर की पृष्ठभूमि भर नहीं रह गया है। बल्कि, यह एक सक्रिय भूमिका निभा सकता है।

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