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KYC के लिए नगालैंड के युवक की आंखें नहीं हो पा रही थी स्कैन, मंत्री बोले- यही रियल स्ट्रगल है

Updated: Fri, 14 Aug 2026 01:34 PM (IST)

नगालैंड के मंत्री तेमजेन इमना अलॉन्ग ने एक वायरल वीडियो साझा किया, जिसमें पूर्वोत्तर के एक व्यक्ति को केवाईसी के लिए आंखें स्कैन कराने में संघर्ष करते देखा गया।

HighLights

  1. नगालैंड मंत्री ने केवाईसी संघर्ष का वीडियो साझा किया।

  2. पूर्वोत्तर के व्यक्ति की आंखें स्कैन नहीं हो पा रही थीं।

  3. तकनीक में सुधार और वैकल्पिक तरीकों की मांग उठी।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नगालैंड के मंत्री तेमजेन इमना अलॉन्ग सोशल मीडिया पर अपने अनोखे और मजाकिया अंदाज के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने एक हल्का-फुल्का और मजेदार वीडियो शेयर किया है, जिसने इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींचा है। वीडियो को शेयर करते हुए मंत्री ने कैप्शन में लिखा है, 'स्ट्रगल इज रियल'। इस वीडियो को अब तक 3.5 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है और 10,000 से ज्यादा लाइक्स मिल चुके हैं।

बता दें कि वायरल हो रहे इस वीडियो में दिखाया गया है कि पूर्वोत्तर का एक व्यक्ति अपने केवाईसी (KYC) की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। वीडियो में कुछ ग्रामीण उस व्यक्ति की मदद करने के लिए उसके चेहरे को पकड़े हुए और उसकी पलकों को खींचते हुए नजर आ रहे हैं, ताकि कैमरे में उसकी एक साफ तस्वीर आ सके और ऐप उसका चेहरा पहचान सके।

सोशल मीडिया पर क्यों छिड़ी बहस?

इस वीडियो के सामने आने के बाद लोगों ने तकनीक की कमियों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और सरकार व अधिकारियों से इसका कोई व्यावहारिक समाधान निकालने की मांग की है। एक यूजर ने कमेंट किया कि समस्या तकनीक में है, आपमें नहीं। सॉफ्टवेयर बनाते समय भारतीयों की सभी शारीरिक विशेषताओं को ध्यान में नहीं रखा गया।

एक अन्य यूजर ने एक्स के एआई चैटबॉट 'ग्रोक' से पूछा कि क्या कोई ऐसा आईरिस स्कैनर उपलब्ध है जो 'एपिकैंथिक फोल्ड' (यानी एकहरी पलकें/मोनोलिड) वाले लोगों की आसानी से स्कैनिंग कर सके। पूर्वोत्तर के लोगों में यह शारीरिक विशेषता आम तौर पर पाई जाती है, जिसमें ऊपरी पलक आंखों के अंदरूनी हिस्से को ढक लेती है।

विकल्प की मांग कर रहे लोग

इतना ही नहीं लोगों का कहना है कि प्राकृतिक जैविक विशेषताओं की वजह से किसी को भी परेशानी नहीं होनी चाहिए। कई यूजर्स ने सुझाव दिया कि फिंगरप्रिंट या अन्य वैकल्पिक तरीकों को भी मान्यता दी जानी चाहिए। इसके अलावा कुछ यूजर्स ने यह भी सवाल उठाया कि चीन, जापान और अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में इसके लिए क्या तकनीक अपनाई जाती है, वैसी व्यवस्था भारत में क्यों नहीं लागू की जा रही है।