हूती का नया खतरा! क्या बाब-अल-मंदेब से भारत पर मंडराएगा तेल-गैस संकट, क्यों अहम है यह समुद्री रास्ता?
मार्च 2026 में तेल संकट के बाद, अब यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा की है।

(यह तस्वीर AI से बनाई गई है)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मार्च 2026 में पश्चिम एशिया युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति और कीमतों में अचानक आए उथल-पुथल के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए रणनीतिक कदम उठाए। चार महीने बाद स्थिति यह थी कि देश मुख्य रूप से रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता बढ़ाते हुए संकट का सामना करने में सफल रहा।
मध्य पूर्व संघर्ष और हार्मुज जलडमरूमध्य में नाकेबंदी के कारण भारत को गंभीर तेल-गैस संकट का सामना करना पड़ा था। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत ने रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदना शुरू किया, जिससे आपूर्ति श्रृंखला को कुछ हद तक स्थिर किया जा सका, फिर भी तेल-गैस के बड़े हिस्से की आपूर्ति मिडिल ईस्ट से ही होती रही।
लेकिन अब एक नया संकट खड़ा हो गया है। यमन के हुती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ नौसैनिक नाकेबंदी की आधिकारिक घोषणा कर दी है। ईरान पर अमेरिकी हमले और यमन के बंदरगाहों व हवाई अड्डों की घेराबंदी के बाद यह कदम उठाया गया है।
क्षेत्रीय तनाव में तेजी से वृद्धि के साथ ही भारत पर भी इसका सीधा असर पड़ने की आशंका है। ऊर्जा आयात पर निर्भर भारत के लिए यह नया विकास चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। सरकार वैकल्पिक स्रोतों और रणनीतिक भंडारण के माध्यम से स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही है।
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हूती विद्रोहियों की धमकी
हूतियों का कहना है कि यह नाकेबंदी सऊदी अरब की ओर से यमन की राजधानी की घेराबंदी के जवाब में की गई है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब दुनिया अभी भी होर्मुज जलडमरूमध्य में सप्लाई में आई रुकावट के झटके से उबर रही है, जिसकी वजह से दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गई थीं।
भले ही अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जारी है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें वापस $100 से नीचे आ गई हैं। हालांकि, होर्मुज में लगातार रुकावटों और अब सऊदी अरब से तेल के निर्यात में संभावित रुकावट के कारण कीमतें फिर से तेजी से बढ़ सकती हैं।
इस कदम से मिडिल ईस्ट से ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से शिपिंग अभी भी लगभग ठप है। इसलिए, अगर लाल सागर से होने वाले ट्रैफिक में कोई रुकावट आती है तो इससे ग्लोबल ऑयल ट्रेड पर टकराव का असर और गहरा हो जाएगा।
युद्ध शुरू होने और ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को असल में बंद कर दिए जाने के बाद, सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल का निर्यात रेड सी के यानबू (Yanbu) बंदरगाह के रास्ते करना शुरू कर दिया था।
पिछले महीने यानबू बंदरगाह से हर दिन रिकॉर्ड 4.19 मिलियन बैरल तेल भेजा गया हालांकि, यह रास्ता अभी भी जोखिम भरा है क्योंकि यहां से गुजरने वाले टैंकरों पर हूती विद्रोहियों के हमले का खतरा बना रहता है, जिन्होंने पहले भी लाल सागर में कमर्शियल जहाजों को निशाना बनाया था।

बाब अल-मंडेब स्ट्रेट क्यों अहम है?
होर्मुज जलडमरूमध्य की तरह ही, बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य भी समुद्री शिपिंग के लिए बेहद अहम रास्ता है। अमेरिका-ईरान के बीच तनाव के बाद से सऊदी अरब के लिए होर्मुज के विकल्प के तौर पर इसकी अहमियत और बढ़ गई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण, सऊदी अरब अपने क्रूड एक्सपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य के रास्ते भेज रहा है और भारत इन शिपमेंट्स का एक बड़ा खरीदार रहा है।
बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार पर स्थित है और हिंद महासागर को स्वेज नहर से जोड़ता है। अरबी भाषा में बाब अल-मंडेब का मतलब 'आंसुओं का द्वार' है जो कि उन खतरनाक समुद्री रास्तों का प्रतीक है जिनसे होकर जहाज गुजरते हैं।
यह पूरब में यमन और पश्चिम में जिबूती और इरिट्रिया के बीच स्थित है। कुछ साल पहले तक, दुनिया का 15% समुद्री व्यापार बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होकर गुजरता था। यहां से गुजरने वाले जहाजों में आमतौर पर कच्चा तेल, LNG, अनाज और उपभोक्ता सामान होता है।
हालांकि, 2023 में जब ईरान समर्थित हूतियों ने लाल सागर में कमर्शियल जहाजों पर हमले शुरू किए, तब से यहां से होने वाला टव्यापार काफी कम हो गया है। इस वजह से कई जहाजों को अफ्रीका महाद्वीप के रास्ते घूमकर जाना पड़ा।
वर्तमान समय में बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाज कोई ट्रांजिट फीस नहीं देते हैं। लेकिन, अप्रैल में लॉयड्स लिस्ट ने रिपोर्ट किया कि हूती इस जलमार्ग का इस्तेमाल करने वाले जहाजों पर टोल लगाने के प्रस्तावों पर विचार कर रहे हैं; ऐसा ईरान के उस प्रस्ताव के बाद हो रहा है जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य में भी इसी तरह के शुल्क लगाने की बात कही गई थी।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
भारत पर इसका असर कई तरह से पड़ सकता है, जो नाकेबंदी की समयसीमा पर निर्भर करेगा। अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद से सऊदी अरब भारत के लिए कच्चे तेल के शीर्ष तीन आपूर्तिकर्ताओं में से एक रहा है। सऊदी अरब की आपूर्ति में किसी भी तरह की रुकावट से भारत के कच्चे तेल की खरीद का दायरा कम हो जाएगा, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि रूसी कच्चा तेल मुख्य स्रोत बना रहेगा।

