भारतेंदु हरिश्चंद्र: 16 साल की उम्र में खोला बच्चों के लिए स्कूल, रचनाओं से कहलाए आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक
भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है। उन्होंने अपनी रचनाओं से देशभक्ति और सामाजिक सुधार को ...और पढ़ें

हिंदी साहित्य को दी नई पहचान।
करियर डेस्क, नई दिल्ली। साहित्यिक माहौल में पले-बढ़े भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 09 सितंबर, 1850 में बनारस के एक बेहद ही संपन्न परिवार में हुआ था। भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में देशभक्ति और सामाजिक सुधार जैसी समस्याओं का बखूबी से जिक्र किया था। उन्होंने नाटक, पत्रकारिता और कविता के माध्यम से हिंदी साहित्य को एक नई पहचान दी। यही वजह है कि हिंदी साहित्य का एक पूरा कालखंड भारतेंदु युग के नाम से जाना जाता है।
आज जिस भारतेंदु को विश्वभर में आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक के रूप में जाना जाता है। उन्हीं भारतेंदु का शुरुआती सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्हें बीच में ही अपनी शिक्षा अधूरी छोड़नी पड़ी। लेकिन बावजूद उन्होंने उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, बंगाली, मराठी और गुजराती सहित कई भाषाओं में स्वयं ज्ञान हासिल किया और हिंदी साहित्य को एक नई पहचान दी।
बचपन में उठा सिर से मां-बाप का साया
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म बनारस के एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता गोपालचंद्र एक कवि थे और वह गिरिधर दास के नाम से रचनाएं लिखते थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र बचपन से ही साहित्यक माहौल में पले-बढ़े थे। लेकिन यह सफर उनके लिए बिल्कुल भी आसान नहीं था। महज 5 साल की उम्र में ही उनके सिर से मां और 10 साल की उम्र में पिता का साया उठ गया था। यही वजह है कि वे अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर सके। लेकिन बावजूद उन्होंने इसके उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, बंगाली, मराठी और गुजराती सहित कई भाषाओं में अपने ज्ञान को विकसित किया। बता दें, भारतेंदु ने अपनी शुरुआती शिक्षा काशी के क्वींस कॉलेज से पूरी की थी।
बंगाल के साहित्य का हिंदी में अनुवाद
महज 10 साल की उम्र में अपने मां-बाप को खोने के बाद भारतेंदु 15 साल की उम्र में जगनाथ पुरी गए। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने बंगाल के साहित्यिक को समझा। बता दें, उस समय बंगाल में आधुनिक विचारों, शिक्षा और सामाजिक सुधार आंदोलनों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था। इसी अनुभव ने भारतेंदु को प्रभावित किया। जिसके बाद उन्होंने बंगाली साहित्यिक की कई रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया।
हिंदी को दी नई दिशा
भारतेंदु ने आधुनिक हिंदी साहित्य को एक नई दिशा दी। बता दें, भारतेंदु युग से पहले हिंदी साहित्य में ब्रज भाषा का प्रभुत्व था। उन्होंने हिंदी भाषा के विकास के लिए गद्य लेखन के लिए खड़ी बोली हिंदी को अपनाया। साथ ही हिंदी पत्रकारिता की नींव रखी। बता दें, उन्होंने अंधेरी नगरी और भारत दुर्दशा जैसे नाटकों के माध्यम से साहित्य को समाज से जोड़ा। इसके अलावा, उन्होंने साहित्य को मनोरंजन का आधार ही नहीं। बल्कि समाज और राष्ट्र की समस्याओं को सुलझाने का एक भी मार्ग बनाया। साथ ही उन्होंने अंधविश्वास, सामाजिक कुरीतियों, आर्थिक शोषण और विदेशी शासन पर खुलकर रचनाएं लिखी।
महज 16 साल की उम्र में खोला स्कूल
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने महज 16 साल की उम्र में साल 1866 में गरीब बच्चों के लिए एक पाठशाला शुरू की थी। बाद में यही पाठशाला हरिश्चंद्र पीजी के नाम से विकसित हुई। इसके साथ ही 1868 में उन्होंने बंगाली नाटक विद्यासुंदर का हिंदी अनुवाद किया। इसी समय भारतेंदु ने हरिश्चंद्र मैगजीन, हरिश्चंद्र चंद्रिका जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया।
क्यों कहा जाता है भारतेंदु को हिंदी साहित्य का जनक
भारतेंदु एक ऐसे समय में उभरकर सामने आए जब हिंदी साहित्य ब्रज भाषा तक ही सीमित थी। लेकिन भारतेंदु ने अपने युग में हिंदी गद्य को एक नई पहचान दी। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिये समाज में फैले अंधविश्वास, औपनिवेशिक शोषण, सामाजिक कुरितियों जैसे विषयों को उजागर किया। बता दें, साल 1880 में काशी के विद्वानों ने हरिश्चंद्र को भारतेंदु की उपाधि दी थी। विद्वानों द्वारा दी गई यह उपाधि उनके नाम का स्थायी हिस्सा बन गई और वह भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम से प्रसिद्ध हो गए।
