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प्रमोशन में आरक्षण पर एमपी हाई कोर्ट की दो टूक- नहीं लांघ सकते 50% की सीमा; मुख्य सचिव करेंगे निगरानी

Published: Tue, 08 Sep 2026 07:08 PM (IST)

एमपी हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण पर अहम अंतरिम आदेश दिया है। कोर्ट ने 50% आरक्षण ...और पढ़ें

मप्र हाईकोर्ट भवन। (फाइल फोटो)

मप्र हाईकोर्ट भवन। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. पदोन्नति में 50% आरक्षण सीमा का उल्लंघन नहीं होगा।

  2. मुख्य सचिव को निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

  3. कर्मचारी की पदोन्नति पर विचार का अधिकार, गारंटी नहीं।

डिजिटल डेस्क, जबलपुर। मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण के विवाद पर हाई कोर्ट ने अहम अंतरिम आदेश जारी किया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश के किसी भी सरकारी विभाग में पदोन्नति के दौरान आरक्षण की 50 प्रतिशत की निर्धारित सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस व्यवस्था का कड़ाई से पालन कराने और इसकी निगरानी की जिम्मेदारी सीधे राज्य के मुख्य सचिव को सौंपी है।

अंतरिम आदेश में हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी प्रकरण में स्थापित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि आरक्षण की अधिकतम 50 प्रतिशत सीमा को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी तरीके से पार नहीं किया जा सकता।

पदोन्नति पर विचार कर्मचारी का अधिकार, लेकिन प्रमोशन की गारंटी नहीं

हाई कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि किसी कर्मचारी को पदोन्नति के लिए विचार किए जाने का अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर कर्मचारी को पदोन्नति देना अनिवार्य होगा। पदोन्नति के लिए कर्मचारियों पर विचार प्रचलित नियमों और कानूनी प्रावधानों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

कोर्ट का यह निर्देश ऐसे समय आया है, जब राज्य के विभिन्न विभागों में पदोन्नति की प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से विवाद और कानूनी पेच बना हुआ है।

याचिकाकर्ताओं की दलील- प्रमोशन के बाद वापस करना मुश्किल

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा ने कोर्ट के समक्ष तर्क रखा कि राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में लगातार पदोन्नतियां की जा रही हैं। उनका कहना था कि एक बार किसी कर्मचारी को पदोन्नति मिल जाने के बाद उसे दोबारा मूल पद पर वापस भेजना बेहद कठिन हो जाता है।

उन्होंने आशंका जताई कि यदि बाद में पदोन्नतियां नियमों के विपरीत पाई गईं तो याचिकाकर्ताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इस दौरान पूर्व में हुई पदोन्नतियों का उदाहरण देते हुए 2016 के आरबी राय प्रकरण का भी उल्लेख किया गया।

राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया हवाला

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के जरनैल सिंह एवं अन्य बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले में 20 अगस्त 2026 को पारित आदेश का हवाला दिया। कोर्ट को बताया गया कि शीर्ष अदालत ने संबंधित अपीलों को तीन महीने के भीतर उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं।

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सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग की ओर से भी आरक्षण को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई। दलील दी गई कि कई विभागों में संबंधित वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व पहले से मौजूद है और मेरिट के आधार पर चयनित कर्मचारी भी उपलब्ध हैं, इसके बावजूद पदोन्नति में आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है।

अंतिम फैसला आना बाकी

फिलहाल हाई कोर्ट के समक्ष वर्ष 2025 के पदोन्नति नियमों और आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को लेकर विवाद लंबित है। कोर्ट ने इस चरण में अंतरिम व्यवस्था के तहत आरक्षण की निर्धारित सीमा का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।

इस मामले में अंतिम निर्णय अभी आना बाकी है। हाई कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 1 दिसंबर 2026 की तारीख तय की है। तब तक प्रदेश के सरकारी विभागों में पदोन्नति प्रक्रिया के दौरान 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा के पालन की निगरानी मुख्य सचिव के स्तर से की जाएगी।