बांधवगढ़ से चलकर प्रयागराज पहुंचे हाथी, 250 किमी की यात्रा ने जगाई नई उम्मीद; क्या बन रहा नया एलिफेंट कॉरिडोर?
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से निकले दो हाथी 250 किमी का सफर तय कर प्रयागराज के जंगल में पहुंचे हैं, जिससे ...और पढ़ें

प्रयागराज के जंगल में दिखाई दे रहे बांधवगढ़ से निकले जंगली हाथी। (सौजन्य- वन विभाग)
HighLights
हाथियों ने रीवा-मीरजापुर होकर प्रयागराज का किया सफर।
विशेषज्ञों को नए हाथी कॉरिडोर विकसित होने की उम्मीद है।
रेडियो कॉलर से हाथियों की आवाजाही का अध्ययन होगा।
संजय कुमार शर्मा, उमरिया। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से निकले दो जंगली हाथियों ने करीब ढाई सौ किमी का सफर तय कर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के जंगल में डेरा जमाया है। ये हाथी रीवा-मीरजापुर होकर प्रयागराज पहुंचे। वन्यजीव विशेषज्ञों में अब हाथियों की आवाजाही को लेकर जिज्ञासा उत्पन्न हुई है। विशेषज्ञ शोध करेंगे कि यह नया हाथी कॉरिडोर विकसित हुआ है या पूर्व में भी कॉरिडोर रहा है। यदि इस यात्रा मार्ग का वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जाता है, तो भविष्य में एक नए संभावित हाथी कॉरिडोर की तस्वीर सामने आ सकती है।
रेडियो कॉलर से मिल रही लोकेशन
जानकारी के अनुसार बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व क्षेत्र से निकले हाथियों की यह जोड़ी जंगलों, वन क्षेत्रों और उनके बीच उपलब्ध प्राकृतिक रास्तों से होते हुए रीवा-मीरजापुर क्षेत्र की ओर बढ़ी और आगे प्रयागराज के जंगलों तक पहुंची। इनमें शामिल नर हाथी के गले में रेडियो कॉलर लगा हुआ है। इससे उसकी लोकेशन और आवाजाही के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जा सकती है। रेडियो कॉलर के माध्यम से हाथी के प्रतिदिन तय किए गए रास्ते, रुकने के स्थान और अलग-अलग क्षेत्रों में बिताए गए समय का विश्लेषण संभव है।
अध्ययन का महत्वपूर्ण अवसर
बांधवगढ़-संजय टाइगर रिजर्व परिक्षेत्र में हाथियों की मौजूदगी और लगातार बढ़ती आवाजाही को देखते हुए उनके आवास उपयोग, मूवमेंट पैटर्न और मानव-हाथी संघर्ष वाले संवेदनशील क्षेत्रों को समझने के लिए तीन वर्षीय वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तावित है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून के शोधकर्ताओं के मार्गदर्शन में प्रस्तावित इस दीर्घकालिक अध्ययन का उद्देश्य हाथियों की गतिविधियों को वैज्ञानिक आधार पर समझना है।
ऐसे में बांधवगढ़ से प्रयागराज तक इन दोनों हाथियों की करीब 250 किलोमीटर की यात्रा अध्ययन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि रेडियो कॉलर से प्राप्त लोकेशन डेटा को वन क्षेत्रों के नक्शे, जलस्रोतों, कृषि क्षेत्रों, मानव बस्तियों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के साथ मिलाकर देखा जाए तो हाथियों द्वारा इस्तेमाल किए गए पूरे मार्ग की तस्वीर तैयार की जा सकती है।
संतुलन की चुनौती
हाथियों की लंबी दूरी की आवाजाही का एक महत्वपूर्ण पहलू मानव-हाथी संघर्ष भी है। जंगल से बाहर निकलकर हाथियों के कृषि क्षेत्रों में पहुंचने पर फसलों को नुकसान होने की घटनाएं सामने आती हैं। यदि हाथियों का यह मार्ग भविष्य में नियमित आवाजाही का रास्ता बनता है तो रीवा, मीरजापुर और आसपास के वन क्षेत्रों में भी उनके संभावित आवागमन को लेकर वन विभाग को पहले से तैयारी करनी होगी।
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वैज्ञानिक अध्ययन से यह समझने में मदद मिल सकती है कि हाथी किन प्राकृतिक परिस्थितियों में लंबी दूरी तय करते हैं और किन कारणों से अपने ज्ञात क्षेत्र से बाहर निकलते हैं। भोजन, पानी, आवासीय दबाव, मौसमी परिस्थितियां और सामाजिक व्यवहार जैसे कारकों का भी इसमें अध्ययन किया जा सकता है।
बाघिन के सफर ने खोला विंध्य-मैकल वन्यजीव गलियारे का रास्ता
बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से निकलकर छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व तक पहुंची एक बाघिन का सफर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच सक्रिय विंध्य-मैकल वन्यजीव गलियारे के लिए महत्वपूर्ण प्रमाण बनकर सामने आया है। विशेषज्ञों के मुताबिक बाघिन ने जंगलों, पहाड़ी क्षेत्रों और नदी-नालों से जुड़े प्राकृतिक रास्तों का इस्तेमाल करते हुए लंबी दूरी तय की। इस दौरान उसने मानव बस्तियों और कृषि क्षेत्रों से बचते हुए अपना रास्ता बनाया। इस बाघ कारिडोर का भी अध्ययन किया जा रहा है।
