'ज्ञान भारतम' मिशन: 1.22 करोड़ पांडुलिपियां मिलीं, सिर्फ पांच लाख का हो पाया डिजिटलीकरण; उज्जैन में दो संस्थानों ने शुरू की अत्याधुनिक स्कैनिंग
'ज्ञान भारतम' मिशन के तहत देशभर में मिली 1.22 करोड़ पांडुलिपियों में से केवल पांच लाख का ही डिजिटलीकरण हुआ है। अब उज्जैन के दो संस्थानों में अत्याधुनि ...और पढ़ें

उज्जैन में पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जा रहा।
HighLights
ज्ञान भारतम मिशन में 1.22 करोड़ पांडुलिपियां मिलीं, 5 लाख डिजिटाइज्ड।
उज्जैन के दो संस्थानों में अत्याधुनिक मशीनों से डिजिटलीकरण शुरू हुआ।
जर्जर पांडुलिपियों के लिए नॉन-कॉन्टैक्ट स्कैनर का उपयोग किया जा रहा है।
धीरज गोमे, उज्जैन। देशभर में भारतीय ज्ञान परंपरा की पांडुलिपियों को संरक्षित करने के लिए चल रहे 'ज्ञान भारतम' मिशन के तहत अब तक 1.22 करोड़ पांडुलिपियां प्राप्त हो चुकी हैं, लेकिन इनमें से करीब पांच लाख ही डिजिटल रूप से अपलोड की जा सकी हैं। मिशन तक पहुंचीं पांडुलिपियों में करीब 96 प्रतिशत का अभी डिजिटलीकरण नहीं हो पाया है। यह जानकारी ज्ञान भारतम के निदेशक इंद्रजीत सिंह ने उज्जैन में आयोजित पांडुलिपि धारक सम्मेलन में दी। उन्होंने कहा कि पांडुलिपियों के संरक्षण के साथ उनका डिजिटलीकरण भी आवश्यक है, ताकि उनमें निहित ज्ञान पूरी दुनिया तक पहुंच सके।
उज्जैन के दो संस्थानों में शुरू हुआ डिजिटलीकरण
इसी राष्ट्रीय चुनौती के बीच उज्जैन के दो संस्थानों में पांडुलिपि डिजिटलीकरण (अंकरूपण) की व्यवस्था शुरू हुई है। महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय में पांडुलिपि केंद्र का उद्घाटन किया गया और डिजिटलीकरण मशीन का अनावरण हुआ।
वहीं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के सिंधिया प्राच्यविद्या शोध प्रतिष्ठान में भी पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण के लिए अत्याधुनिक मशीन का उद्घाटन किया गया।
इन दोनों संस्थानों में अब दुर्लभ पांडुलिपियों को सुरक्षित रखते हुए उच्च गुणवत्ता में डिजिटल स्वरूप देने का काम आगे बढ़ाया जा सकेगा।
मशीन से पांडुलिपि स्कैन करना पहला चरण है। इसके बाद कैटलागिंग, विषयवार वर्गीकरण, लिप्यंतरण, अनुवाद, डिजिटल डेटाबेस और शोध से जोड़ना होगा।
उज्जैन में 18 हजार से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियां
उज्जैन में इस शुरुआत का महत्व इसलिए भी है क्योंकि सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के सिंधिया प्राच्यविद्या शोध प्रतिष्ठान में 18 हजार से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियां सुरक्षित हैं। इनमें भारतीय संस्कृति, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष, साहित्य और इतिहास से संबंधित सामग्री शामिल है।
महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय में शुरू हुए केंद्र से भी पांडुलिपियों के संरक्षण, शोध और प्रकाशन को गति मिलने की उम्मीद है। ज्ञान भारतम के परियोजना निदेशक अनिर्बाण दास ने कहा कि विश्वविद्यालय पांडुलिपियों पर विशेष कार्य कर रहा है, जिससे शोधार्थियों और विद्यार्थियों को अनुसंधानात्मक ज्ञान-संवर्धन होगा।
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जर्जर पांडुलिपियों का बिना छुए होता डिजिटलीकरण
- अत्यंत जीर्ण, फटी या कपड़े पर लिखी दुर्लभ पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के लिए नान-कान्टैक्ट बुक स्कैनर का उपयोग किया जाता है।
- वी-शेप क्रेडल और फ्लैट ग्लास प्लेट से पांडुलिपि को सहारा दिया जाता है, जबकि कोल्ड एलईडी लाइट के उपयोग से तेज गर्मी से उनका बचाव होता है।
- हाई-रिजोल्यूशन कैमरा बिना दबाव डाले प्रत्येक पृष्ठ का फोटो लेता है।
- इसके बाद विशेष सॉफ्टवेयर से फोटो को स्पष्ट कर डिजिटल प्रति के रूप में सुरक्षित किया जाता है।
ज्ञान भारतम पोर्टल : दुनिया तक पहुंचेगा ज्ञान
पिछले वर्ष सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित ज्ञान भारतम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ज्ञान भारतम पोर्टल का शुभारंभ किया था। इसके माध्यम से पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, संरक्षण और सार्वजनिक पहुंच को गति देने का प्रयास किया जा रहा है।