धार भोजशाला केस : हाई कोर्ट में मंदिर पक्ष ने दिया इस्लामी सिद्धांत का हवाला, कहा- जबरन कब्जे की जमीन पर मस्जिद मान्य नहीं
धार भोजशाला के धार्मिक स्वरूप पर इंदौर हाई कोर्ट में सुनवाई जारी है। याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी के वकील ने इसे वाग्देवी मंदिर बताते हुए तर्क दिया कि इस ...और पढ़ें

धार स्थित भोजशाला (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, इंदौर। धार की ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में बुधवार से एक बार फिर नियमित सुनवाई शुरू हो गई। मामले में याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने विस्तृत तर्क रखते हुए इसे वाग्देवी मंदिर बताया।
हदीस और हिंदू कानून का हवाला
कोर्ट में दलील देते हुए अधिवक्ता ने इस्लामिक कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी की जमीन जबरन लेकर उस पर मस्जिद का निर्माण नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा हुआ भी हो तो उसे वापस करने के उदाहरण भी मौजूद हैं। वहीं हिंदू मान्यता के अनुसार, जहां एक बार मंदिर रहा हो, वह स्थल हमेशा मंदिर ही माना जाता है। इन दोनों आधारों पर भोजशाला को मंदिर बताया गया।
सर्वे और मूर्तियों के साक्ष्य पेश
अदालत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट और पुरातात्विक साक्ष्यों का भी हवाला दिया गया। बताया गया कि भोजशाला परिसर से अब तक 150 से अधिक देवी-देवताओं की मूर्तियां, आकृतियां और चित्र मिले हैं, जो किसी मस्जिद में संभव नहीं हैं।
साथ ही ब्रिटिश संग्रहालय में रखी वाग्देवी की मूर्ति का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उस पर अंकित विवरण के अनुसार इसे राजा भोज ने स्थापित किया था।
राजा भोज के ग्रंथों का जिक्र
बहस के दौरान 1908 के राजपत्र और राजा भोज द्वारा लिखित ग्रंथों का भी उल्लेख किया गया। अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि इन ग्रंथों में मंदिर निर्माण, हवन कुंड की संरचना और देवी मूर्ति के स्वरूप का विस्तार से वर्णन है। भोजशाला में मौजूद हवन कुंड का आकार भी उन्हीं विवरणों से मेल खाता है, जिससे मंदिर होने के दावे को बल मिलता है।
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बहस पूरी, गुरुवार को अगली सुनवाई
बुधवार को कुलदीप तिवारी पक्ष की दलीलें पूरी हो गईं। अब गुरुवार को अन्य याचिकाकर्ता अंतरसिंह की ओर से पक्ष रखा जाएगा। इस मामले में कुल चार याचिकाएं और एक अपील लंबित हैं, जिनकी सुनवाई एक साथ की जा रही है।
6 अप्रैल से जारी इस सुनवाई पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका फैसला भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर अहम दिशा तय कर सकता है।