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    भोजशाला विवाद : MP हाईकोर्ट में परमारकालीन साक्ष्य पेश, मंदिर समर्थक पक्ष ने कहा- बंद हो गैर-हिंदुओं का प्रवेश

    Updated: Fri, 10 Apr 2026 08:41 PM (IST)

    मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में भोजशाला विवाद पर सुनवाई के पांचवें दिन मंदिर समर्थक पक्ष ने तर्क दिए। याचिकाकर्ता के वकील ने भोजशाला को परमारकालीन ...और पढ़ें

    धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला (फाइल फोटो)

    धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला (फाइल फोटो)

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    डिजिटल डेस्क, इंदौर। धार की ऐतिहासिक भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में हो रही सुनवाई के पांचवें दिन शुक्रवार को भी मंदिर के समर्थन में तर्क दिए गए। साथ ही मांग की गई कि भोजशाला में 24 घंटे पूजा का अधिकार दिया जाए और भोजशाला परिसर में गैर हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाए।

    परमारकालीन है भोजशाला

    याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी के वकील मनीष गुप्ता ने कहा कि प्रकांड विद्वान राजा भोज ने शिक्षा के क्षेत्र में अद्भुत काम किए। सिर्फ धार की भोजशाला ही नहीं परमारकाल में कई अन्य स्थानों पर शिक्षा के मंदिर बनाए गए थे। इन मंदिरों में मिले पत्थर और भोजशाला में मिले पत्थर एक ही काल के हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि भोजशाला का निर्माण परमार काल में हो चुका था। राजा भोज द्वारा लिखित पुस्तकों में समराड्गण सूत्रधार और सरस्वती कंठाभरण प्रमुख हैं। समराड्गण सूत्रधार में यहां तक बताया गया है कि देवताओं की मूर्ति कितनी बड़ी होनी चाहिए। भोजशाला में स्थापित रही वाग्देवी की मूर्ति का वर्णन इससे शत-प्रतिशत मिलता है।

    उन्होंने कहा कि उज्जैन के जूना महाकालेश्वर मंदिर में लगे पत्थर पर लिखी लिपि और भोजशाला के पत्थरों पर लिखी लिपि एक ही समय की है। इससे यह सिद्ध होता है कि भोजशाला मंदिर है और इसका निर्माण मस्जिद से बहुत पहले हो चुका था। अब इस मामले में सुनवाई 15 अप्रैल को होगी। इस दिन भी मनीष गुप्ता की ओर से ही तर्क रखे जाएंगे।

    ASI सर्वे का दिया हवाला

    मनीष गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि भोजशाला के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सर्वे में जो तथ्य सामने आए हैं, वे भोजशाला को मंदिर सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन वह राजा भोज और अन्य शोधार्थियों द्वारा लिखी गई पुस्तकों के माध्यम से यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भोजशाला का निर्माण राजा भोज के समय यानी परमारकाल में हुआ था।

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    मंदिर के पत्थरों से हुआ था मस्जिद का निर्माण

    मनीष गुप्ता ने कोर्ट को यह भी बताया कि भोजकाल में शिक्षालयों को सरस्वती कंठाभरण, मंदिर को प्रसाद और घर को मंदिर भी कहा जाता था। इसका उल्लेख पुस्तकों में भी मिलता है। सर्वे में मिले खंबे और पत्थरों पर संस्कृत में उकेरी बातें सिद्ध कर रही हैं कि भोजशाला के पत्थरों से मस्जिद बनाई गई थी। परमारकालीन अन्य मंदिरों में देवताओं की मूर्तियों की बनावट, मुद्राएं वैसी ही हैं जैसी भोजशाला के सर्वे में मिली मूर्तियों की हैं।

    यह भी पढ़ें- भोजशाला विवाद : MP हाईकोर्ट में हिंदू पक्ष की दलील- 'सवा सौ साल पहले सिद्ध हो गया था, यह मंदिर ही है'

    शिक्षा प्राप्त करने दूर-दूर से आते थे शोधार्थी

    भोजशाला में दूर-दूर से शोधार्थी अध्ययन के लिए आते थे। भोजशाला के सर्वे में यह बात भी सामने आई कि लाइम स्टोन पर उकेरे अक्षर खराब नहीं हुए, ये खंबों पर ऐसी जगह हैं कि नजर नहीं आ रहे थे इसलिए आक्रांताओं के हमले में सुरक्षित रह गए।